Wednesday, December 12, 2012

Almost Eleven Minutes

ये सृष्टि कैसे उत्पन्न हुई?
ये स्वयंभू है या किसी ईश्वर
खुदा, या गॉड की कृति?
इस बहस में पड़ने की मेरी
न तो कोई रूचि है और न
काबिलियत
मगर ‘वो’ एहसास सृष्टि के
साथ ही पैदा हुआ प्रतीत
होता है
वही, जिसके वशीभूत होकर
‘श्रद्धा’ और ‘मनु’ आकर्षित हुए
या ‘आदम’ और ‘ईव’ पास आये
फिर क्या फर्क पड़ता है जो इन्हें
स्वर्ग से निष्काषित कर दिया गया
और ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता
जिससे ये साबित हो कि ‘श्रद्धा-मनु’
‘आदम-ईव’ कभी अपने निर्णय पर
शर्मिंदा हुए थे
क्या इनका आकर्षण महज
जिस्मानी था?
नहीं…..ऐसा मुमकिन नहीं
इसमें संदेह नहीं कि जिस्म में
बेपनाह आकर्षण होता है;
मखमली केश-राशियाँ
धवल-ओजस्वी ललाट
करीनेदर, कमान सी भवें
नाजुक पलकों से रक्षित
मासूम निगाहें
नुकीली नासिका तथा
कलियों जैसे रस-सिक्त
अधरोष्ठ
धवल -श्वेत दंतावलियाँ
नटखट जिह्वा का अलौकिक
स्वाद
गुलाबी गाल, सलीकेदार ग्रीवा
और उससे अवरोही पृष्ठ-प्रदेश
अग्र भाग में एक मांसल नलिका
से पृथक दो गरिमामय
अर्धवृत्ताकार मांसल संरचनाएं
और इनपर सुर्ख वृत्ताकार वलयों
के मध्य घुंडीदार आकृतियाँ
इनसे अवरोहित उदर-मध्य
आदि-बिंदु
सघन-कुंचित रोम प्रदेश से
अवरोहित मांसल मुकुलित
कलियों का युग्म
आश्वस्ति प्रदान करती भुजाएं
कदली-स्तम्भ सी मांसल जांघें
जांघों के पृष्ठ में जिस्म को
संतुलन प्रदान करते दोनों
मांसल अर्धवृत्त
ये सब बेहद आकर्षित करते हैं
ये मदहोश, बल्कि बेहोश कर
सकते हैं
लेकिन ये खिंचाव यांत्रिक
नहीं हो सकता
शरीर की अपनी अलग ही
भाषा होती है
जिसे समझने और आत्मसात
करने के लिए
रूहानी नज़र और निरावृत्त
मस्तिष्क की अपेक्षा है
अन्यथा, जिस्मानी आकर्षण
महज क्षणिक और यांत्रिक
ही हो सकता है
हाँ मगर, इसके लिए असीम
धैर्य और आकर्षण को पवित्रता
प्रदान करने के लिए
प्रथम श्रेणी की सच्चरित्रता
अपेक्षित होती है
अन्यथा, दो जिस्मों को
संतुष्ट होने के लिए
ऑलमोस्ट एलेवेन मिनट्स*
ही तो चाहिए!!
*’एलेवेन मिनट्स’ विश्वप्रसिद्ध ब्राजीली लेखक पाउलो कोएल्हो की प्रख्यात कृति है!

Wednesday, November 28, 2012

Abke Hum Milein To Kuchh Yun Karna

अबके हम मिलें तो कुछ यूँ करना 
हाथ मेरा अपने हाथों में लेना मगर 
अपनी आँखों को नम ना करना 
तमाम उम्र की तन्हाई जज़्ब है रूहों में 
बज़ाहिर ख़ामोशी पसर जाएगी हर सू 
मगर तुम इसका ज़रा भी ग़म न करना।
मुमकिन है कुछ फूल चुनके गुलशन से
लेके आऊंगा और नज़र करूँगा तेरी 
मगर तुम खुशबू-ए-ग़ुल पे  जरा भी 
करम न करना 
हर सहर तेरे नाम से हर शाम तेरे 
नाम की है 
रूबरू तुम होगे तो मुमकिन है 
होश खो बैठूं 
मगर तुम इन एहसासों पे 
जरा भी करम न करना 
गुलों में तेरा अक्स दरिया में तेरी 
रवानी देखी है 
सामने तेरे धडकनें तेज होंगी 
सांसें बेकाबू होंगी 
मगर तुम अपनी बेरुखी अपना 
तकल्लुफ कम ना करना 
तमाम उम्र गुजारी है तसव्वुर में तेरे 
लाज़िमी है दीदार होगा तो 
बहक जाऊं मैं 
मगर तुम मुझे थामकर खुद पे 
कोई सितम न करना 
अबके हम मिलें तो  कुछ यूँ करना ...!

Wednesday, November 7, 2012

Tahzeeb Aur Schizophrenic

इस सभ्य और सुसंस्कृत दुनिया में 
तहज़ीब को काफी ऊंचा दर्जा दिया गया है 
सवाल उठता है कि ,
तहज़ीब, आखिर है क्या?
शायद, किसी बात पर स्वाभाविक 
क्रोध आने पर भी 
उसे ज़ाहिर ना होने देना 
अंतर्मन में उठ रही वेदना को 
चेहरे की मुस्कराहट के झूठे 
आवरण के पीछे दफ्न कर देना 
कटुता को व्यंग्य की शालीन 
चाशनी में लपेट कर पेश करना 
स्वाभाविक और आदिम प्रवृत्तियों को 
सार्वजनिक ना होने देना 
या ऐसा ही कुछ , शायद तहज़ीब है 
जिसका  अनुपालन करने की अपेक्षा 
सभी ज़हीन और शालीन लोगों से 
की जाती है 
लेकिन वो शख्श,
जब किसी बात पे नाराज़ होता है तो 
 सरे-ए-आम ज़ाहिर कर देता है 
अंतर्मन की पीड़ा को 
आंसुओं में बहने देता है 
कोई बात बुरी लगी तो 
सीधे- सपाट लफ़्ज़ों में 
मुंह पर ही कह देता है 
बाग़ में खिली कलियों और 
गुलों को रुक कर एकटक 
निहारने लगता है, और 
कभी-कभी तो उनको हौले से 
चूम भी लेता है  
नीले गगन में रुई के फाहों जैसे 
सफ़ेद बादलों से बनती-बिगड़ती 
विविध आकृतियों को अनिमेष 
देखने लगता है 
धूपबत्ती से उठती धुंएँ की 
पतली लकीर, या नल से गिरती 
पानी की धारा, या सड़क पर एक 
के पीछे एक अनियमित लेकिन 
निरंतर दौड़ती गाड़ियों को 
दत्तचित्त होकर निहारता है 
इन सबमें अन्तर्निहित क्रमिक 
निरंतरता में शायद, उसे जीवन 
की निरंतरता का आभास होता है 
वो, दरिया की इतराती-इठलाती 
 अठखेलियाँ देखकर 
मुस्कुरा उठता है 
बाग के कोने में आपस में  एक 
दोस्ताना गुत्थमगुत्था में उलझे 
पिल्लों को देखकर खिलखिला 
उठता है 
कोई रोमांटिक कविता पढ़ते हुए 
खुद को रूमानी और पुनर्नवा 
महसूस करने लगता है 
वहीँ किसी ट्रेजिक कहानी की 
 नायिका के आंसुओं का साथ 
अपनी हिचकियों से देता है 
ऐसा ही है वो 
और उसे इस तहजीब की 
दुनिया में, नफासत से पगे 
ज़हीन और शालीन लोग 
अपनी ज़मात में जगह 
नहीं देते, और उन लोगों ने 
मिलकर उसे स्किजोफ्रेनिक 
क़रार दिया है !!

 

Thursday, November 1, 2012

Mere Hisse Ka Sara Gham

अब कोई सुकून, कोई सहूलियत नहीं 
बस, मेरे हिस्से की सारी दुश्वारियां दे दो 
अब कोई ग़ुल, कोई पत्ता, कोई बूटा नहीं 
बस, मेरे हिस्से की सारी  नागफनियाँ दे दो 
अब कोई खुदा, कोई विसाल-ए-सनम नहीं 
बस, सब-ए-फुरकत की सारी तनहाइयाँ दे दो 
अब दिल भर गया है, टुकड़ा-टुकड़ा ज़िन्दगी से 
बस, मेरे हिस्से की सारी नाकामियां दे दो 
अब कोई नजाकत, कोई उल्फत नहीं 
बस, मेरे हिस्से का सारा ग़म 
सारी पशेमानियाँ दे दो...........................!!!

Wednesday, October 24, 2012

Chalna kab tak

शाम की उंगली पकड़ के 
 फिर लौटा हूँ घर 
दिन भर महफ़िल में था 
लोगों के चेहरे देखकर 
अपने चेहरे का भाव 
तय किया 
पर, अब रात आ रही है 
रात में मै खुद के साथ 
होता हूँ 
बगैर किसी आवरण के 
मेघ-रहित बादल  की तरह 
महफ़िल के दोस्तों !!
मेरी असलियत शाम के 
साथ खुलती है 
और रात भर निर्विकार 
निर्दोष रहती है 
सुबह से मैं फिर उसी 
दौड़ में शामिल हो
जाता हूँ  जिसमें, मालूम 
नहीं, चलना कब तक है 
पहुंचना कहाँ है ?

Ek Daur Aisa Bhi

ऐसा भी एक दौर आया 
जीवन में 
जब सोचने पर मजबूर 
हुआ कि 
क्या मेरे लिए सफ़र 
जारी रख पाना 
मुमकिन होगा ?
उस 'यथार्थबोध' ने 
मानो तिमिर के गहरे 
कूप में धकेल दिया था 
अचानक, दुनिया बेहद 
अजनबी और भयावह 
लगने लगी थी 
रंग, आँखों में मानो 
चुभने से लगे थे 
संगीत, महज़ शोर 
लगने लगा था 
आज, मुझमे हिम्मत है 
सच कहने की -
और सच ये है कि 
सफ़र से तौबा करने का 
फैसला मैंने कर ही 
तो लिया था .......
मगर, ऐसा नहीं होना था 
उस घनघोर तिमिर से 
एक किरण निकली 
उस शोर से एक मधुर 
सुर-तरंग प्रकट हुई 
मैंने अपने कंधे पर 
एक स्नेहिल-कोमल 
स्पर्श महसूस किया 
आँख खुली तो पार्श्व में 
'वो' थी 
उसकी आँखें नव-आशा, 
नव-जीवन से परिपूर्ण थीं 
उसका अस्तित्व 
स्फूर्ति का जाग्रत पुंज 
प्रतीत होता था 
उसको देखकर 
मेरे वजूद में मानो 
नवीन उत्साह प्रवाहित 
होने लगा 
मैंने स्वयं को पुनर्नवा 
महसूस किया 
कुछ बोलने के लिए 
मेरे होंठ हिले भर थे कि 
उसने अपने दांये हाथ 
की दो उंगलियाँ मेरे 
होंठों पर रख दी 
फिर अपने स्नेहासिक्त 
हाथों में मेरा हाथ 
लेकर कहा 
"आओ, चलते हैं "
"सफ़र कभी अधूरा 
छोड़ते हैं भला "? उसने 
कहा था 
और मैं .....
मृत अतीत को पीछे 
छोड़कर 
अनंत  भविष्य के 
अनजाने पथ पर 
मानो, मंत्रमुग्ध सा 
चल पड़ा, 
उसके साथ-साथ .....!!

Wednesday, October 3, 2012

Aansu Nahin, Pani

उसे नफरत की हद तक 
चिढ़ थी, आंसू बहाने से 
जब दिल टूटा 
कतार में पीछे छूटा 
जब बेहद क़रीबी लोग 
बेहद दूर हो गए 
हसीं-रूमानी ख्वाब 
शीशे की मानिंद 
चकनाचूर हो गए 
'यार' ने दुनियादारी की 
दुहाई देकर मुहं फेर लिया 
रास्तों ने भी बेरुखी दिखाई 
और मंजिल ने रुख 
बदल लिया 
ऐसे में, हर बार 
आँखें नम हो आईं 
और कुछ बूंदें 
पलकों की देहरी लाँघ कर 
गालों पर आ गईं 
 उसने हर बार खुद को 
शर्मिंदा महसूस किया 
मगर,  ये तय नहीं कर सका 
कि ये शर्मिंदगी 
पराजित होने की थी 
या आंसुओं को बहने से 
ना रोक पाने की 
और फिर उसने खुद को 
दिलासा-सा देते हुए 
मन-ही-मन 
निर्णय किया कि 
"ये आँसू नहीं हैं 
महज पानी हैं"!!!

Sampoorn Adhoorapan

आरम्भ से ही 
तलाश थी  
सम्पूर्णता की 
प्यार,
समर्पण ,
आनंद ,
उल्लास ,
अधिकार ,
ज़िम्मेदारी,
विचार,
कार्य-व्यापार 
सबकुछ, सम्पूर्णता में चाहा 
मगर, 
ये तलाश पूरी हुई 
अधूरेपन में 
 मुझे मिला है 
'सम्पूर्ण अधूरापन' !!

Wednesday, August 29, 2012

Sochta Hun Thoda Rumani Ho Jaun

सोचता हूँ 
कुछ पल के लिए ही सही 
चीजों को एक अलग नज़रिए से 
देखने की कोशिश करूँ 
सामने खड़े सूखे-बदसूरत पेड़ पर 
झल्लाने के बजाय 
उसकी पतली, हवा में लहराती 
टहनी पर पूरब की ओर 
मुंह करके बैठे मैना-युगल को 
देखूं और, मुस्कुराने से 
खुद को न रोकूँ 
ऊँगली में चुभे कांटे को 
कोसने के बजाय 
उसके बिलकुल पास ही खिले हुए 
पीले गुलाब को देखूं और 
बगैर कोई आहट  किये 
उसे हौले से स्पर्श करूँ 
कमरे के वास्तु से लेकर 
टूटे फर्नीचर पर आँख 
तरेरने के बजाय 
पश्चिम की दीवार पर टंगी  
उस पुरानी पेंटिंग को देखूं 
जिसपर लिखा है-
'कोशिशें कामयाब ज़रूर होती हैं'
यादों  के शहर में घूमते हुए 
तानों-उलाहनों, विछोह और उदासी 
के पन्नों को परे रखकर 
उस पन्ने को खोलूं जिसमें-
हमारे  प्रथम मिलन,  संश्लिष्ट 
तप्त  सांसों और तेज धडकनों 
का ब्यौरा दर्ज है 
बोझिल -मनहूस शाम के 
दर पर बैठकर उदास 
होने के बजाय 
आगामी सुबह की चमकती 
हुई देहरी पर सफ़ेद उजाले में 
खुद को तर-ओ-ताज़ा महसूस 
करूँ 
जल रहित और निरर्थक 
गर्जन-तर्जन युक्त 
कारे -कजरारे  मेघों को देखकर 
निराश होने के बजाय 
इनकी अनियंत्रित और उद्दंड 
भागादौड़ी से गगन में निर्मित
 होने वाली उन अनेक अद्भुत और 
 मनोहारी चित्राकृतियों को देखकर 
मन को उन्हीं के साथ घूमने  के 
लिए स्वतंत्र छोड़ दूँ 
सोचता हूँ,
तनिक हंसूं , मुस्कुराऊँ, इतराऊँ 
आज मैं भी 
थोडा रूमानी हो जाऊं .......!!

 

Sunday, August 26, 2012

Smriti Ke Jivashm

स्मृति के जीवाश्म 
स्मृति की एक नाजुक सी 
पगडण्डी पर चलते हुए 
अनायास, मैं जा पहुंचा 
एक अँधेरी-वीरान गुफा में
कुछ भी सूझता नहीं था 
सिवाय निविड़ अंधकार के 
 आँखों को खोले रखना 
या बंद कर  लेना 
बराबर था 
कुछ देर, यूँ ही खड़ा रहा 
अन्यमनस्क, प्रस्तर-मूर्ति सा 
सहसा, एक कमजोर सा
पीला प्रकाश-पुंज
गुफा के एक गवाक्ष से 
प्रस्फुटित हुआ 
और, उसके धुंधले उजाले में 
मैंने पूरी सामर्थ्य से 
अपने परितः देखने और 
महसूस करने की कोशिश की 
अरे .........!!
यहाँ तो मेरे सारे  बीते हुए 'कल' 
उपस्थित थे 
बचपन से यौवन का 
सम्पूर्ण लेखा-जोखा 
सारे उल्लास, सारे उत्सव 
सारी मुस्कुराहटें, सारा उन्माद 
सब यहाँ थीं 
सारी असफलताएं 
सभी अवरोध 
और उनसे दो-चार 
होने की कहानी 
ताने-उलाहने 
रूठने-मनाने के किस्से 
कुछ गरम सांसें 
कुछ तेज धडकनें 
सारी बेक़रारियां 
सारे इंतज़ार 
झूठी टकराहटें 
बेमानी तक़रार 
 अधूरा मिलन ........
मगर, सच्चा प्यार 
सब कुछ तो यहाँ था 
अब मैं इनको स्पष्ट 
देख और महसूस 
कर पा रहा था 
यादें घनीभूत होकर 
जम गईं थीं यहाँ 
और, अब जान पाया मैं 
ये मेरी ही 
'स्मृतियों के जीवाश्म ' थे...!!      
 
 

Friday, August 24, 2012

गणित 
मैं हमेशा गणित का एक 
औसत विद्यार्थी रहा हूँ 
जो साधारण गुणा-भाग 
जोड़ और घटाने  से ज्यादा 
कभी आगे नहीं बढ़ सका 
लेकिन...... 
तुम्हारा व्यक्तित्व मेरे समक्ष
गणित की एक बहुत ही क्लिष्ट  
पहेली की तरह उपस्थित हुआ 
जिसे हल करने की कोशिश 
तो मैं रोज़ करता हूँ 
लेकिन सफल नहीं हो पाता 
हालांकि.............
मैं सफल हो भी सकता हूँ 
 अगर तुम इस पहेली को 
हल करने में 
मेरी तनिक मदद करो 
 क्योंकि , मैं जानता हूँ 
तुम, गणित में 
मेरी तरह 'कमज़ोर' नहीं हो...!!

Tuesday, August 21, 2012

बारिश 
कितनी अजीब है 
ये बारिश भी 
शहर-गाँव 
खेत-खलिहान 
गलियां-सड़कें 
सबको भिगो दिया 
सर से पांव तक 
सराबोर होने के बावज़ूद 
मन का हरएक कोना 
तरस रहा है.......
काश! एक बूंद उसे भी 
मिल जाती तो 
बरसों की जमी हुई धूल 
कुछ तो साफ़ होती 
शायद कोई नया 
अंकुर पनपता .......!!

मेरा जीवन 
मेरा जीवन खुली किताब नहीं है 
इसके कुछ पन्ने गायब हैं 
कुछ स्वच्छ हैं 
कुछ स्याह हैं 
कहीं भाषा क्लिष्ट है 
कहीं वर्तनी की अशुद्धि 
कहीं व्याकरण-दोष 
तो कहीं लिपि अबूझ 
बहरहाल,
अभी भी कुछ पृष्ठ 
कोरे बचे हुए हैं 
जिनपर मैं 
कुछ ऐसा लिखने की 
कोशिश कर रहा हूँ 
जो कम-से-कम 
मेरे लिए तो बोधगम्य हो........!!

Monday, August 20, 2012

काश 
ज़माने की बुतपरस्ती 
देखकर 
दिल करता है 
काश! हम भी 
पत्थर ही होते.........!!
अन्तर्विरोधों का सामंजस्य 
वो खुश नहीं है 
पर मुस्कुराता है 
दिल में वीरानी है मगर 
महफ़िल में गाता है 
उसके लिए 
'अन्तर्विरोधों का सामंजस्य'
ही जीवन है .....................!!
आकाश-कुसुम 
वो शहर 
शहर  की वो गली 
नुक्कड़ पर वो मंदिर 
और गली के आखिरी छोर पर 
वो मकान 
सब वहीं हैं 
बस......
वो एहसास 
वो विश्वास 
वो  लड़ाइयां 
वो तकरार 
वो भोली सी मनुहार 
वो हंसी 
वो मुस्कुराहट 
वो मासूम खिलखिलाहट 
वहां होकर भी 
मेरे  'आकाश-कुसुम '
बन गयी है.................!!
घर 
यूँ  उसे भी अच्छा लगता है 
घर जाना-बोलना- बतियाना
लेकिन.....
ईंट-पत्थरों की दीवारों पर 
लदी छत  को ही तो 
घर नहीं कहते.............!!!