Wednesday, October 3, 2012

Aansu Nahin, Pani

उसे नफरत की हद तक 
चिढ़ थी, आंसू बहाने से 
जब दिल टूटा 
कतार में पीछे छूटा 
जब बेहद क़रीबी लोग 
बेहद दूर हो गए 
हसीं-रूमानी ख्वाब 
शीशे की मानिंद 
चकनाचूर हो गए 
'यार' ने दुनियादारी की 
दुहाई देकर मुहं फेर लिया 
रास्तों ने भी बेरुखी दिखाई 
और मंजिल ने रुख 
बदल लिया 
ऐसे में, हर बार 
आँखें नम हो आईं 
और कुछ बूंदें 
पलकों की देहरी लाँघ कर 
गालों पर आ गईं 
 उसने हर बार खुद को 
शर्मिंदा महसूस किया 
मगर,  ये तय नहीं कर सका 
कि ये शर्मिंदगी 
पराजित होने की थी 
या आंसुओं को बहने से 
ना रोक पाने की 
और फिर उसने खुद को 
दिलासा-सा देते हुए 
मन-ही-मन 
निर्णय किया कि 
"ये आँसू नहीं हैं 
महज पानी हैं"!!!

No comments:

Post a Comment