Wednesday, November 28, 2012

Abke Hum Milein To Kuchh Yun Karna

अबके हम मिलें तो कुछ यूँ करना 
हाथ मेरा अपने हाथों में लेना मगर 
अपनी आँखों को नम ना करना 
तमाम उम्र की तन्हाई जज़्ब है रूहों में 
बज़ाहिर ख़ामोशी पसर जाएगी हर सू 
मगर तुम इसका ज़रा भी ग़म न करना।
मुमकिन है कुछ फूल चुनके गुलशन से
लेके आऊंगा और नज़र करूँगा तेरी 
मगर तुम खुशबू-ए-ग़ुल पे  जरा भी 
करम न करना 
हर सहर तेरे नाम से हर शाम तेरे 
नाम की है 
रूबरू तुम होगे तो मुमकिन है 
होश खो बैठूं 
मगर तुम इन एहसासों पे 
जरा भी करम न करना 
गुलों में तेरा अक्स दरिया में तेरी 
रवानी देखी है 
सामने तेरे धडकनें तेज होंगी 
सांसें बेकाबू होंगी 
मगर तुम अपनी बेरुखी अपना 
तकल्लुफ कम ना करना 
तमाम उम्र गुजारी है तसव्वुर में तेरे 
लाज़िमी है दीदार होगा तो 
बहक जाऊं मैं 
मगर तुम मुझे थामकर खुद पे 
कोई सितम न करना 
अबके हम मिलें तो  कुछ यूँ करना ...!

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