ऐसा भी एक दौर आया
जीवन में
जब सोचने पर मजबूर
हुआ कि
क्या मेरे लिए सफ़र
जारी रख पाना
मुमकिन होगा ?
उस 'यथार्थबोध' ने
मानो तिमिर के गहरे
कूप में धकेल दिया था
अचानक, दुनिया बेहद
अजनबी और भयावह
लगने लगी थी
रंग, आँखों में मानो
चुभने से लगे थे
संगीत, महज़ शोर
लगने लगा था
आज, मुझमे हिम्मत है
सच कहने की -
और सच ये है कि
सफ़र से तौबा करने का
फैसला मैंने कर ही
तो लिया था .......
मगर, ऐसा नहीं होना था
उस घनघोर तिमिर से
एक किरण निकली
उस शोर से एक मधुर
सुर-तरंग प्रकट हुई
मैंने अपने कंधे पर
एक स्नेहिल-कोमल
स्पर्श महसूस किया
आँख खुली तो पार्श्व में
'वो' थी
उसकी आँखें नव-आशा,
नव-जीवन से परिपूर्ण थीं
उसका अस्तित्व
स्फूर्ति का जाग्रत पुंज
प्रतीत होता था
उसको देखकर
मेरे वजूद में मानो
नवीन उत्साह प्रवाहित
होने लगा
मैंने स्वयं को पुनर्नवा
महसूस किया
कुछ बोलने के लिए
मेरे होंठ हिले भर थे कि
उसने अपने दांये हाथ
की दो उंगलियाँ मेरे
होंठों पर रख दी
फिर अपने स्नेहासिक्त
हाथों में मेरा हाथ
लेकर कहा
"आओ, चलते हैं "
"सफ़र कभी अधूरा
छोड़ते हैं भला "? उसने
कहा था
और मैं .....
मृत अतीत को पीछे
छोड़कर
अनंत भविष्य के
अनजाने पथ पर
मानो, मंत्रमुग्ध सा
चल पड़ा,
उसके साथ-साथ .....!!
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