Wednesday, November 7, 2012

Tahzeeb Aur Schizophrenic

इस सभ्य और सुसंस्कृत दुनिया में 
तहज़ीब को काफी ऊंचा दर्जा दिया गया है 
सवाल उठता है कि ,
तहज़ीब, आखिर है क्या?
शायद, किसी बात पर स्वाभाविक 
क्रोध आने पर भी 
उसे ज़ाहिर ना होने देना 
अंतर्मन में उठ रही वेदना को 
चेहरे की मुस्कराहट के झूठे 
आवरण के पीछे दफ्न कर देना 
कटुता को व्यंग्य की शालीन 
चाशनी में लपेट कर पेश करना 
स्वाभाविक और आदिम प्रवृत्तियों को 
सार्वजनिक ना होने देना 
या ऐसा ही कुछ , शायद तहज़ीब है 
जिसका  अनुपालन करने की अपेक्षा 
सभी ज़हीन और शालीन लोगों से 
की जाती है 
लेकिन वो शख्श,
जब किसी बात पे नाराज़ होता है तो 
 सरे-ए-आम ज़ाहिर कर देता है 
अंतर्मन की पीड़ा को 
आंसुओं में बहने देता है 
कोई बात बुरी लगी तो 
सीधे- सपाट लफ़्ज़ों में 
मुंह पर ही कह देता है 
बाग़ में खिली कलियों और 
गुलों को रुक कर एकटक 
निहारने लगता है, और 
कभी-कभी तो उनको हौले से 
चूम भी लेता है  
नीले गगन में रुई के फाहों जैसे 
सफ़ेद बादलों से बनती-बिगड़ती 
विविध आकृतियों को अनिमेष 
देखने लगता है 
धूपबत्ती से उठती धुंएँ की 
पतली लकीर, या नल से गिरती 
पानी की धारा, या सड़क पर एक 
के पीछे एक अनियमित लेकिन 
निरंतर दौड़ती गाड़ियों को 
दत्तचित्त होकर निहारता है 
इन सबमें अन्तर्निहित क्रमिक 
निरंतरता में शायद, उसे जीवन 
की निरंतरता का आभास होता है 
वो, दरिया की इतराती-इठलाती 
 अठखेलियाँ देखकर 
मुस्कुरा उठता है 
बाग के कोने में आपस में  एक 
दोस्ताना गुत्थमगुत्था में उलझे 
पिल्लों को देखकर खिलखिला 
उठता है 
कोई रोमांटिक कविता पढ़ते हुए 
खुद को रूमानी और पुनर्नवा 
महसूस करने लगता है 
वहीँ किसी ट्रेजिक कहानी की 
 नायिका के आंसुओं का साथ 
अपनी हिचकियों से देता है 
ऐसा ही है वो 
और उसे इस तहजीब की 
दुनिया में, नफासत से पगे 
ज़हीन और शालीन लोग 
अपनी ज़मात में जगह 
नहीं देते, और उन लोगों ने 
मिलकर उसे स्किजोफ्रेनिक 
क़रार दिया है !!

 

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