Tuesday, January 22, 2013

दामिनी का जवाब

घने -अँधेरे जंगल से गुजरते हुए 
भला कौन है जो, सहम नहीं जाता?
खूंखार भेडिये , शेर, चीते ......उफ़ !
सोच के भी रोम खड़े हो जाते हैं 
इनका सामना हो जाये तो 
बेचारा इन्सान क्या करेगा?
फिर इनसे बचा तो जहरीले 
सांप,  बिच्छू, कनखजूरे, छिपकलियाँ 
स्पर्श मात्र से इन्सान का शरीर 
नीला पड़ जाये।
इतना ही नहीं, कंकरीला-पथरीला 
दुर्गम रास्ता 
अगल-बगल कांटे-झाड़ियाँ 
बहरहाल, मुसीबतें कितनी भी बड़ी हों 
आखिर ख़त्म तो होती ही हैं 
जंगल कितना भी दुर्गम हो 
खतरनाक हो 
सफ़र जारी  रहे तो आखिर में 
इन्सान उसे पार कर ही लेता है 
और फिर मिलता है चमचमाता 
राजमार्ग 
सभ्यता और संस्कृति के नगर से 
गुजरता हुआ 
इन्सान राहत की सांस लेता है 
खुद की तरह आदमजाद देखता है तो 
सुकून की साँस लेता है।
लेकिन ................
उस रात, सभ्यता-संस्कृति की 
राजधानी दिल्ली में 
चौड़े चमचमाते राजमार्ग पर 
तेज गति से सरपट दौड़ती 
बस के अन्दर काले शीशों के पीछे 
इसी समाज के सदस्यों ने 
'पौरुष' का जैसा परिचय दिया 
क्या ऐसा किसी खतरनाक से 
खतरनाक जंगल में 
खूंखार से खूंखार पशु द्वारा मुमकिन है?
अगर इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए 
'वो' हमारे बीच होती कि 'वो' 
 'सुरक्षित कहाँ  महसूस करती है?'
'सभ्य-सुसंस्कृत, आधुनिक,
जीवों में श्रेष्ठतम मनुष्य के समाज में?' या 
'जंगल' में?
तो इस प्रश्न का आखिर, 
दामिनी क्या जवाब देती?
 

Wednesday, January 16, 2013

ऐसा नहीं

ऐसा नहीं मै किसी  की नज़र में नहीं
जो मेरी नज़र में है बस उसी की नज़र में नहीं 
आईने भी झूठ बोल सकते  हैं 
नुक्स हमेशा मेरी नज़र में नहीं 
आओ तलाशें मंजिल को यहीं 
अब कुछ भी रखा इस सफ़र में नहीं 
शब खामोश और तारीक थी इतनी 
गुम है, दिखता आफताब इस सहर में नहीं 
पतझर में ये तो होना ही था 
शिकवा फ़िज़ूल जो कोई पत्ता शज़र में नहीं।

Thursday, January 3, 2013

बात मुद्दे की करो

बात मुद्दे की करो यूँ न भरमाओ मुझे 
जुर्म गर मैंने किया सूली पे चढाओ मुझे 
मेरे हिस्से का सारा आबे-हयात मुझे दो 
एक चुल्लू से यूँ न बहकाओ मुझे 
फासले अब उल्फत को बढ़ाते नहीं 
दूर रहके यूँ न तरसाओ मुझे 
चारागर हो तो गमे -दिल का इलाज करो 
अब बस भी करो यूँ न सहलाओ मुझे 
तुम ना आओगे अब खुलके कह दो 
झूठे वादों में यूँ न उलझाओ मुझे !!     

Wednesday, December 12, 2012

Almost Eleven Minutes

ये सृष्टि कैसे उत्पन्न हुई?
ये स्वयंभू है या किसी ईश्वर
खुदा, या गॉड की कृति?
इस बहस में पड़ने की मेरी
न तो कोई रूचि है और न
काबिलियत
मगर ‘वो’ एहसास सृष्टि के
साथ ही पैदा हुआ प्रतीत
होता है
वही, जिसके वशीभूत होकर
‘श्रद्धा’ और ‘मनु’ आकर्षित हुए
या ‘आदम’ और ‘ईव’ पास आये
फिर क्या फर्क पड़ता है जो इन्हें
स्वर्ग से निष्काषित कर दिया गया
और ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता
जिससे ये साबित हो कि ‘श्रद्धा-मनु’
‘आदम-ईव’ कभी अपने निर्णय पर
शर्मिंदा हुए थे
क्या इनका आकर्षण महज
जिस्मानी था?
नहीं…..ऐसा मुमकिन नहीं
इसमें संदेह नहीं कि जिस्म में
बेपनाह आकर्षण होता है;
मखमली केश-राशियाँ
धवल-ओजस्वी ललाट
करीनेदर, कमान सी भवें
नाजुक पलकों से रक्षित
मासूम निगाहें
नुकीली नासिका तथा
कलियों जैसे रस-सिक्त
अधरोष्ठ
धवल -श्वेत दंतावलियाँ
नटखट जिह्वा का अलौकिक
स्वाद
गुलाबी गाल, सलीकेदार ग्रीवा
और उससे अवरोही पृष्ठ-प्रदेश
अग्र भाग में एक मांसल नलिका
से पृथक दो गरिमामय
अर्धवृत्ताकार मांसल संरचनाएं
और इनपर सुर्ख वृत्ताकार वलयों
के मध्य घुंडीदार आकृतियाँ
इनसे अवरोहित उदर-मध्य
आदि-बिंदु
सघन-कुंचित रोम प्रदेश से
अवरोहित मांसल मुकुलित
कलियों का युग्म
आश्वस्ति प्रदान करती भुजाएं
कदली-स्तम्भ सी मांसल जांघें
जांघों के पृष्ठ में जिस्म को
संतुलन प्रदान करते दोनों
मांसल अर्धवृत्त
ये सब बेहद आकर्षित करते हैं
ये मदहोश, बल्कि बेहोश कर
सकते हैं
लेकिन ये खिंचाव यांत्रिक
नहीं हो सकता
शरीर की अपनी अलग ही
भाषा होती है
जिसे समझने और आत्मसात
करने के लिए
रूहानी नज़र और निरावृत्त
मस्तिष्क की अपेक्षा है
अन्यथा, जिस्मानी आकर्षण
महज क्षणिक और यांत्रिक
ही हो सकता है
हाँ मगर, इसके लिए असीम
धैर्य और आकर्षण को पवित्रता
प्रदान करने के लिए
प्रथम श्रेणी की सच्चरित्रता
अपेक्षित होती है
अन्यथा, दो जिस्मों को
संतुष्ट होने के लिए
ऑलमोस्ट एलेवेन मिनट्स*
ही तो चाहिए!!
*’एलेवेन मिनट्स’ विश्वप्रसिद्ध ब्राजीली लेखक पाउलो कोएल्हो की प्रख्यात कृति है!

Wednesday, November 28, 2012

Abke Hum Milein To Kuchh Yun Karna

अबके हम मिलें तो कुछ यूँ करना 
हाथ मेरा अपने हाथों में लेना मगर 
अपनी आँखों को नम ना करना 
तमाम उम्र की तन्हाई जज़्ब है रूहों में 
बज़ाहिर ख़ामोशी पसर जाएगी हर सू 
मगर तुम इसका ज़रा भी ग़म न करना।
मुमकिन है कुछ फूल चुनके गुलशन से
लेके आऊंगा और नज़र करूँगा तेरी 
मगर तुम खुशबू-ए-ग़ुल पे  जरा भी 
करम न करना 
हर सहर तेरे नाम से हर शाम तेरे 
नाम की है 
रूबरू तुम होगे तो मुमकिन है 
होश खो बैठूं 
मगर तुम इन एहसासों पे 
जरा भी करम न करना 
गुलों में तेरा अक्स दरिया में तेरी 
रवानी देखी है 
सामने तेरे धडकनें तेज होंगी 
सांसें बेकाबू होंगी 
मगर तुम अपनी बेरुखी अपना 
तकल्लुफ कम ना करना 
तमाम उम्र गुजारी है तसव्वुर में तेरे 
लाज़िमी है दीदार होगा तो 
बहक जाऊं मैं 
मगर तुम मुझे थामकर खुद पे 
कोई सितम न करना 
अबके हम मिलें तो  कुछ यूँ करना ...!

Wednesday, November 7, 2012

Tahzeeb Aur Schizophrenic

इस सभ्य और सुसंस्कृत दुनिया में 
तहज़ीब को काफी ऊंचा दर्जा दिया गया है 
सवाल उठता है कि ,
तहज़ीब, आखिर है क्या?
शायद, किसी बात पर स्वाभाविक 
क्रोध आने पर भी 
उसे ज़ाहिर ना होने देना 
अंतर्मन में उठ रही वेदना को 
चेहरे की मुस्कराहट के झूठे 
आवरण के पीछे दफ्न कर देना 
कटुता को व्यंग्य की शालीन 
चाशनी में लपेट कर पेश करना 
स्वाभाविक और आदिम प्रवृत्तियों को 
सार्वजनिक ना होने देना 
या ऐसा ही कुछ , शायद तहज़ीब है 
जिसका  अनुपालन करने की अपेक्षा 
सभी ज़हीन और शालीन लोगों से 
की जाती है 
लेकिन वो शख्श,
जब किसी बात पे नाराज़ होता है तो 
 सरे-ए-आम ज़ाहिर कर देता है 
अंतर्मन की पीड़ा को 
आंसुओं में बहने देता है 
कोई बात बुरी लगी तो 
सीधे- सपाट लफ़्ज़ों में 
मुंह पर ही कह देता है 
बाग़ में खिली कलियों और 
गुलों को रुक कर एकटक 
निहारने लगता है, और 
कभी-कभी तो उनको हौले से 
चूम भी लेता है  
नीले गगन में रुई के फाहों जैसे 
सफ़ेद बादलों से बनती-बिगड़ती 
विविध आकृतियों को अनिमेष 
देखने लगता है 
धूपबत्ती से उठती धुंएँ की 
पतली लकीर, या नल से गिरती 
पानी की धारा, या सड़क पर एक 
के पीछे एक अनियमित लेकिन 
निरंतर दौड़ती गाड़ियों को 
दत्तचित्त होकर निहारता है 
इन सबमें अन्तर्निहित क्रमिक 
निरंतरता में शायद, उसे जीवन 
की निरंतरता का आभास होता है 
वो, दरिया की इतराती-इठलाती 
 अठखेलियाँ देखकर 
मुस्कुरा उठता है 
बाग के कोने में आपस में  एक 
दोस्ताना गुत्थमगुत्था में उलझे 
पिल्लों को देखकर खिलखिला 
उठता है 
कोई रोमांटिक कविता पढ़ते हुए 
खुद को रूमानी और पुनर्नवा 
महसूस करने लगता है 
वहीँ किसी ट्रेजिक कहानी की 
 नायिका के आंसुओं का साथ 
अपनी हिचकियों से देता है 
ऐसा ही है वो 
और उसे इस तहजीब की 
दुनिया में, नफासत से पगे 
ज़हीन और शालीन लोग 
अपनी ज़मात में जगह 
नहीं देते, और उन लोगों ने 
मिलकर उसे स्किजोफ्रेनिक 
क़रार दिया है !!

 

Thursday, November 1, 2012

Mere Hisse Ka Sara Gham

अब कोई सुकून, कोई सहूलियत नहीं 
बस, मेरे हिस्से की सारी दुश्वारियां दे दो 
अब कोई ग़ुल, कोई पत्ता, कोई बूटा नहीं 
बस, मेरे हिस्से की सारी  नागफनियाँ दे दो 
अब कोई खुदा, कोई विसाल-ए-सनम नहीं 
बस, सब-ए-फुरकत की सारी तनहाइयाँ दे दो 
अब दिल भर गया है, टुकड़ा-टुकड़ा ज़िन्दगी से 
बस, मेरे हिस्से की सारी नाकामियां दे दो 
अब कोई नजाकत, कोई उल्फत नहीं 
बस, मेरे हिस्से का सारा ग़म 
सारी पशेमानियाँ दे दो...........................!!!