Thursday, November 1, 2012

Mere Hisse Ka Sara Gham

अब कोई सुकून, कोई सहूलियत नहीं 
बस, मेरे हिस्से की सारी दुश्वारियां दे दो 
अब कोई ग़ुल, कोई पत्ता, कोई बूटा नहीं 
बस, मेरे हिस्से की सारी  नागफनियाँ दे दो 
अब कोई खुदा, कोई विसाल-ए-सनम नहीं 
बस, सब-ए-फुरकत की सारी तनहाइयाँ दे दो 
अब दिल भर गया है, टुकड़ा-टुकड़ा ज़िन्दगी से 
बस, मेरे हिस्से की सारी नाकामियां दे दो 
अब कोई नजाकत, कोई उल्फत नहीं 
बस, मेरे हिस्से का सारा ग़म 
सारी पशेमानियाँ दे दो...........................!!!

Wednesday, October 24, 2012

Chalna kab tak

शाम की उंगली पकड़ के 
 फिर लौटा हूँ घर 
दिन भर महफ़िल में था 
लोगों के चेहरे देखकर 
अपने चेहरे का भाव 
तय किया 
पर, अब रात आ रही है 
रात में मै खुद के साथ 
होता हूँ 
बगैर किसी आवरण के 
मेघ-रहित बादल  की तरह 
महफ़िल के दोस्तों !!
मेरी असलियत शाम के 
साथ खुलती है 
और रात भर निर्विकार 
निर्दोष रहती है 
सुबह से मैं फिर उसी 
दौड़ में शामिल हो
जाता हूँ  जिसमें, मालूम 
नहीं, चलना कब तक है 
पहुंचना कहाँ है ?

Ek Daur Aisa Bhi

ऐसा भी एक दौर आया 
जीवन में 
जब सोचने पर मजबूर 
हुआ कि 
क्या मेरे लिए सफ़र 
जारी रख पाना 
मुमकिन होगा ?
उस 'यथार्थबोध' ने 
मानो तिमिर के गहरे 
कूप में धकेल दिया था 
अचानक, दुनिया बेहद 
अजनबी और भयावह 
लगने लगी थी 
रंग, आँखों में मानो 
चुभने से लगे थे 
संगीत, महज़ शोर 
लगने लगा था 
आज, मुझमे हिम्मत है 
सच कहने की -
और सच ये है कि 
सफ़र से तौबा करने का 
फैसला मैंने कर ही 
तो लिया था .......
मगर, ऐसा नहीं होना था 
उस घनघोर तिमिर से 
एक किरण निकली 
उस शोर से एक मधुर 
सुर-तरंग प्रकट हुई 
मैंने अपने कंधे पर 
एक स्नेहिल-कोमल 
स्पर्श महसूस किया 
आँख खुली तो पार्श्व में 
'वो' थी 
उसकी आँखें नव-आशा, 
नव-जीवन से परिपूर्ण थीं 
उसका अस्तित्व 
स्फूर्ति का जाग्रत पुंज 
प्रतीत होता था 
उसको देखकर 
मेरे वजूद में मानो 
नवीन उत्साह प्रवाहित 
होने लगा 
मैंने स्वयं को पुनर्नवा 
महसूस किया 
कुछ बोलने के लिए 
मेरे होंठ हिले भर थे कि 
उसने अपने दांये हाथ 
की दो उंगलियाँ मेरे 
होंठों पर रख दी 
फिर अपने स्नेहासिक्त 
हाथों में मेरा हाथ 
लेकर कहा 
"आओ, चलते हैं "
"सफ़र कभी अधूरा 
छोड़ते हैं भला "? उसने 
कहा था 
और मैं .....
मृत अतीत को पीछे 
छोड़कर 
अनंत  भविष्य के 
अनजाने पथ पर 
मानो, मंत्रमुग्ध सा 
चल पड़ा, 
उसके साथ-साथ .....!!

Wednesday, October 3, 2012

Aansu Nahin, Pani

उसे नफरत की हद तक 
चिढ़ थी, आंसू बहाने से 
जब दिल टूटा 
कतार में पीछे छूटा 
जब बेहद क़रीबी लोग 
बेहद दूर हो गए 
हसीं-रूमानी ख्वाब 
शीशे की मानिंद 
चकनाचूर हो गए 
'यार' ने दुनियादारी की 
दुहाई देकर मुहं फेर लिया 
रास्तों ने भी बेरुखी दिखाई 
और मंजिल ने रुख 
बदल लिया 
ऐसे में, हर बार 
आँखें नम हो आईं 
और कुछ बूंदें 
पलकों की देहरी लाँघ कर 
गालों पर आ गईं 
 उसने हर बार खुद को 
शर्मिंदा महसूस किया 
मगर,  ये तय नहीं कर सका 
कि ये शर्मिंदगी 
पराजित होने की थी 
या आंसुओं को बहने से 
ना रोक पाने की 
और फिर उसने खुद को 
दिलासा-सा देते हुए 
मन-ही-मन 
निर्णय किया कि 
"ये आँसू नहीं हैं 
महज पानी हैं"!!!

Sampoorn Adhoorapan

आरम्भ से ही 
तलाश थी  
सम्पूर्णता की 
प्यार,
समर्पण ,
आनंद ,
उल्लास ,
अधिकार ,
ज़िम्मेदारी,
विचार,
कार्य-व्यापार 
सबकुछ, सम्पूर्णता में चाहा 
मगर, 
ये तलाश पूरी हुई 
अधूरेपन में 
 मुझे मिला है 
'सम्पूर्ण अधूरापन' !!

Wednesday, August 29, 2012

Sochta Hun Thoda Rumani Ho Jaun

सोचता हूँ 
कुछ पल के लिए ही सही 
चीजों को एक अलग नज़रिए से 
देखने की कोशिश करूँ 
सामने खड़े सूखे-बदसूरत पेड़ पर 
झल्लाने के बजाय 
उसकी पतली, हवा में लहराती 
टहनी पर पूरब की ओर 
मुंह करके बैठे मैना-युगल को 
देखूं और, मुस्कुराने से 
खुद को न रोकूँ 
ऊँगली में चुभे कांटे को 
कोसने के बजाय 
उसके बिलकुल पास ही खिले हुए 
पीले गुलाब को देखूं और 
बगैर कोई आहट  किये 
उसे हौले से स्पर्श करूँ 
कमरे के वास्तु से लेकर 
टूटे फर्नीचर पर आँख 
तरेरने के बजाय 
पश्चिम की दीवार पर टंगी  
उस पुरानी पेंटिंग को देखूं 
जिसपर लिखा है-
'कोशिशें कामयाब ज़रूर होती हैं'
यादों  के शहर में घूमते हुए 
तानों-उलाहनों, विछोह और उदासी 
के पन्नों को परे रखकर 
उस पन्ने को खोलूं जिसमें-
हमारे  प्रथम मिलन,  संश्लिष्ट 
तप्त  सांसों और तेज धडकनों 
का ब्यौरा दर्ज है 
बोझिल -मनहूस शाम के 
दर पर बैठकर उदास 
होने के बजाय 
आगामी सुबह की चमकती 
हुई देहरी पर सफ़ेद उजाले में 
खुद को तर-ओ-ताज़ा महसूस 
करूँ 
जल रहित और निरर्थक 
गर्जन-तर्जन युक्त 
कारे -कजरारे  मेघों को देखकर 
निराश होने के बजाय 
इनकी अनियंत्रित और उद्दंड 
भागादौड़ी से गगन में निर्मित
 होने वाली उन अनेक अद्भुत और 
 मनोहारी चित्राकृतियों को देखकर 
मन को उन्हीं के साथ घूमने  के 
लिए स्वतंत्र छोड़ दूँ 
सोचता हूँ,
तनिक हंसूं , मुस्कुराऊँ, इतराऊँ 
आज मैं भी 
थोडा रूमानी हो जाऊं .......!!

 

Sunday, August 26, 2012

Smriti Ke Jivashm

स्मृति के जीवाश्म 
स्मृति की एक नाजुक सी 
पगडण्डी पर चलते हुए 
अनायास, मैं जा पहुंचा 
एक अँधेरी-वीरान गुफा में
कुछ भी सूझता नहीं था 
सिवाय निविड़ अंधकार के 
 आँखों को खोले रखना 
या बंद कर  लेना 
बराबर था 
कुछ देर, यूँ ही खड़ा रहा 
अन्यमनस्क, प्रस्तर-मूर्ति सा 
सहसा, एक कमजोर सा
पीला प्रकाश-पुंज
गुफा के एक गवाक्ष से 
प्रस्फुटित हुआ 
और, उसके धुंधले उजाले में 
मैंने पूरी सामर्थ्य से 
अपने परितः देखने और 
महसूस करने की कोशिश की 
अरे .........!!
यहाँ तो मेरे सारे  बीते हुए 'कल' 
उपस्थित थे 
बचपन से यौवन का 
सम्पूर्ण लेखा-जोखा 
सारे उल्लास, सारे उत्सव 
सारी मुस्कुराहटें, सारा उन्माद 
सब यहाँ थीं 
सारी असफलताएं 
सभी अवरोध 
और उनसे दो-चार 
होने की कहानी 
ताने-उलाहने 
रूठने-मनाने के किस्से 
कुछ गरम सांसें 
कुछ तेज धडकनें 
सारी बेक़रारियां 
सारे इंतज़ार 
झूठी टकराहटें 
बेमानी तक़रार 
 अधूरा मिलन ........
मगर, सच्चा प्यार 
सब कुछ तो यहाँ था 
अब मैं इनको स्पष्ट 
देख और महसूस 
कर पा रहा था 
यादें घनीभूत होकर 
जम गईं थीं यहाँ 
और, अब जान पाया मैं 
ये मेरी ही 
'स्मृतियों के जीवाश्म ' थे...!!