स्मृति के जीवाश्म
स्मृति की एक नाजुक सी
पगडण्डी पर चलते हुए
अनायास, मैं जा पहुंचा
एक अँधेरी-वीरान गुफा में
कुछ भी सूझता नहीं था
सिवाय निविड़ अंधकार के
आँखों को खोले रखना
या बंद कर लेना
बराबर था
कुछ देर, यूँ ही खड़ा रहा
अन्यमनस्क, प्रस्तर-मूर्ति सा
सहसा, एक कमजोर सा
पीला प्रकाश-पुंज
गुफा के एक गवाक्ष से
प्रस्फुटित हुआ
और, उसके धुंधले उजाले में
मैंने पूरी सामर्थ्य से
अपने परितः देखने और
महसूस करने की कोशिश की
अरे .........!!
यहाँ तो मेरे सारे बीते हुए 'कल'
उपस्थित थे
बचपन से यौवन का
सम्पूर्ण लेखा-जोखा
सारे उल्लास, सारे उत्सव
सारी मुस्कुराहटें, सारा उन्माद
सब यहाँ थीं
सारी असफलताएं
सभी अवरोध
और उनसे दो-चार
होने की कहानी
ताने-उलाहने
रूठने-मनाने के किस्से
कुछ गरम सांसें
कुछ तेज धडकनें
सारी बेक़रारियां
सारे इंतज़ार
झूठी टकराहटें
बेमानी तक़रार
अधूरा मिलन ........
मगर, सच्चा प्यार
सब कुछ तो यहाँ था
अब मैं इनको स्पष्ट
देख और महसूस
कर पा रहा था
यादें घनीभूत होकर
जम गईं थीं यहाँ
और, अब जान पाया मैं
ये मेरी ही
'स्मृतियों के जीवाश्म ' थे...!!
Bahut khub mitra,,,,ek ek shabd sammohit karne wala to hai hi sath hi kisi k bhi svayam ko khud me samahit kar dene k bhav se bhi paripurn hai.....excellent friend :)
ReplyDeletegod bless
Sarita ji, prashansha evam protsahan ke liye kotishah dhanyavaad!
DeleteMere blog ko subscibe karen tatha anya kavitaon ko bhi padhen, aapki sargarbhit pratikriyaon ka intzar rahega!!