Thursday, January 23, 2020

बहुत प्यार करना, कितना प्यार करना होता है?

"बहुत प्यार करना"
कितना प्यार करना होता है?

कैसे कोई आश्वस्त हो कि
"बहुत" वाक़ई बहुत है?

जब आप कहते हैं कि आप
उसे दिल की अतल "गहराइयों" से
प्रेम करते हैं तो

उसके पास क्या पैमाना है
आपके दिल की "गहराई" को मापने का?

सारे भौतिक पैमाने इस जगह
पूरी तरह अनुपयोगी हैं

पैमाने के अभाव में हम
प्यार को उपमा, तुलना या रूपक
के सहारे व्यक्त करने की कोशिश करते हैं

लेकिन ये कोशिश भी निरर्थक है
जब "मूल राशि" ही अपरिमित है 
तो उसकी सार्थक तुलना या संगति
किसी अन्य राशि से कैसे संभव होगी 
भला?

तो, भला इसका समाधान क्या है?
क्या प्रेम करना ही छोड़ दें?
या प्रेम जताना छोड़ दें?

प्रेम करना या न करना 
आपके वश में नहीं है

प्रेम आपके अधीन नहीं है
प्रेम को जताना, उसे व्यक्त करना
बहुत कुछ आपके वश में है

जब आप किसी से अपने "बहुत" प्रेम
का इजहार करें तो
उसकी सहमति या स्वीकृति ही
आपके प्रेम को भौतिक वैधता प्रदान करेगी
यही एक पैमाना है प्रेम को मापने का
जिसके कोई नियम-क़ायदे नहीं हैं
ये पूर्णतः व्यक्तिनिष्ठ है

तो, सामने वाला यदि आपके प्यार को
स्वीकार न करे, उससे सहमत न हो
तो उससे शिकायत न करें
अपनी अस्वीकृति या असहमति में
वो भी उतना ही सही है जितने आप

तो, "बहुत" प्रेम करें, बार-बार प्रेम करें
लेकिन
प्रेम को मापने,आजमाने या साबित करने
की कोशिश न करें।

Friday, January 3, 2020

ग़ज़ल

बोला मैंने नहीं कुछ अभी
तुम अभी से ख़फ़ा हो गए
बुझ गयी रोशनी गर तो क्या
जल के ख़ुद ही शमा हो गए।
हम पे साया था जिनका कभी
वो शज़र ही फ़ना हो गए
दिल मे आतिश मेरे था मगर
यूँ हुआ हम घटा हो गए।
जलजलों से डरे ना कभी
बुलबुलों में फ़ना हो गए
कट गया साथ तेरे सफ़र
और हम रहनुमा हो गए।
सच कहाँ तुमसे बोला गया
क्या हुआ बेजुबां हो गए
इक नज़र यार की क्या पड़ी
संग भी हमजुबां हो गए।
साथ रहना मुनासिब न था
और हम बेवफ़ा हो गए।
रात बाकी अभी थी मगर
यूँ हुआ हम ज़ुदा हो गए।
शर्म आ ही गयी दर्द को
ज़ख्म ही जब दवा हो गए
बहते-बहते लहर की तरह
कश्ती ख़ुद बादबां हो गए।
साथ गुल का न आसां रहा
ख़ार ही हमनवा हो गए
झील-पर्वत घटाएं-बहारें सबा
तुमने देखा सभी मेहरबां हो गए।
वो हमारे रहे ही कहाँ
उनके वादे हवा हो गए
अच्छा होता सताते हमें बेतरह
उनके ख़ामोश शिक़वे सज़ा हो गए
इक तुम्हारा इशारा मिला और हम
चल पड़े इस क़दर कारवां हो गए
एक वादा जो तुमने किया
सारे पल ख़ुशनुमा हो गए।
एक ज़रा सी मुलाकात में
जानेमन जानेजां हो गए।I

Friday, December 27, 2019

नाकारा मसीहा

घर वैसे भी काफी पुराना था
जीर्ण-शीर्ण प्रायः वीरान
उदासियों-उपेक्षाओं को
दीवारों के कोनों और पर्दों
की सलवटों में छुपाये हुए
मैं जब अंदर दाख़िल हुआ
तो मेरा स्वागत एक
आदिम मगर जिजीविषा से
भरी मुस्कुराहट ने किया
जो अभी भी जीवित थी
वीरानियों के साम्राज्य को
चुनौती-सी देती हुई
मेरा दिल बैठने ही वाला था
कि उसने धीरे से मुझे छुआ
और पूरी शक्ति से अपनी
नाज़ुक बाहों में समेटने की
कोशिश की और इस कोशिश में
लड़खड़ा कर गिरने ही वाली थी
मैंने थाम लिया
सहारा देकर बैठाया
उसने अपनी बेहद तेज हो गयी
सांसों को धीरे-धीरे संयत किया
दोनों एक-दूसरे को देर तक 
देखते रहे अपलक अवाक
मैंने आँखों-आँखों में ही उसे
आश्वस्त किया,
"मैं लौटाऊँगा इस घर की ख़ुशी
मुस्कान, उल्लास, उमंग
पुनर्नवा करूँगा इस घर को"
उसने बस पलकों को झुका लिया
उसने कुछ कहा नहीं
बस पलकें झुका लीं
शायद ये मेरे प्रस्ताव को 
मौन स्वीकृति और समर्थन था
अब शुरू हुआ मेरा प्रयास-संघर्ष
जब कभी मुझे लगा
मेरा प्रयास रंग ला रहा है
बाधाओं ने पलटवार किया और
मैं प्रयास-बिंदु से भी पीछे
धकेल दिया गया
फिर भी, कोशिशें जारी रहीं-
दोनों तरफ से
धीरे-धीरे मैंने महसूस किया
मेरा अस्तित्व विलीन होता जा रहा है
उस घर की वीरानियों में
मैं उस घर की उदासियों का
अभिन्न हिस्सा बनता जा रहा था
लेकिन, अब देर हो चुकी थी
पीछे हटने या बाहर जाने का
कोई उपाय नहीं था
अब मैं भी उसी वीरानी का हिस्सा हूँ
कोई भी नहीं कह सकता कि
मेरा कभी कोई स्वतंत्र अस्तित्व भी था
हालांकि मैं हूँ अब भी-
निस्तेज-निष्फल-पराजित
सोचता हुआ कि,
"क्या ये कोई ट्रैप था मुझे फंसाने का
बूढ़े शेर की तरह या
इस घर का दुर्भाग्य 
जो इस घर को मिला
मुझ जैसा नाकारा मसीहा?"

Monday, July 24, 2017

#राज़दार #महफ़िल #hindi #yqbaba #yqdidi #yopowrimo #allahabad Follow my writings on https://www.yourquote.in/amrendr-prtaap-sinh-c019/quotes/ #yourquote

Friday, July 7, 2017

भूल

ये भूल थी मेरी
सीमित करना चाहता था
तुम्हें
नियंत्रित करना चाहता था
तुम्हारी स्वच्छंद उड़ान को
एक परिभाषा में
क़ैद करना चाहता था
तुम्हारे क़िरदार को
लपेटना चाहता था तुम्हें
परंपराओं की मोटी चादर में
बांधना चाहता था
तुम्हारी खुशबुओं को
ढालना चाहता था तुम्हें
एक सांचे में
मगर,
ऐसा हुआ है कभी?
बांध सका है
कोई हवा को?
क़ैद कर सका है
कोई गुलों की खुशबू?
तुम अप्रतिम हो,
शाश्वत हो, शुद्ध हो
तुम्हारा क़िरदार
किसी परिभाषा में नहीं
बांधा जा सकता
अपनी सोच के दायरे में
तुम्हें सीमित करने की
कोशिश ही
मेरी सबसे बड़ी भूल थी
आज इस भूल का
परिष्कार करता हूँ
तुम जैसी हो
तुम्हें वैसी ही
स्वीकार करता हूँ।

Thursday, July 6, 2017

I May Not Be That Wise

You just can't judge
Dreams by their size
Your aura and
Scintillating charm
Is flowing
Through my eyes
Oh my angel!
I'm drowning in
The ocean of your
Adorable love for
I may not be
That wise.

Wednesday, February 15, 2017

यादों का सरमाया

बात पूरी भी न की उठ के चल दिए,
तुम मौसम तो न थे फिर भी बदल गए।
गुलों में रंग-ओ-बू सब तुम्हीं से थी,
गए तुम तो सब हवा के संग गए।
मंज़िल तुम्हारा दर था रस्ते तुम्हारी गलियां,
हम जाते तो कहाँ जाते रहगुज़र के हो लिये।
यादों का सरमाया ही अब पास है मेरे,
फिरता हूँ हर क़दम दिल में सफर लिए।