ये भूल थी मेरी
सीमित करना चाहता था
तुम्हें
नियंत्रित करना चाहता था
तुम्हारी स्वच्छंद उड़ान को
एक परिभाषा में
क़ैद करना चाहता था
तुम्हारे क़िरदार को
लपेटना चाहता था तुम्हें
परंपराओं की मोटी चादर में
बांधना चाहता था
तुम्हारी खुशबुओं को
ढालना चाहता था तुम्हें
एक सांचे में
मगर,
ऐसा हुआ है कभी?
बांध सका है
कोई हवा को?
क़ैद कर सका है
कोई गुलों की खुशबू?
तुम अप्रतिम हो,
शाश्वत हो, शुद्ध हो
तुम्हारा क़िरदार
किसी परिभाषा में नहीं
बांधा जा सकता
अपनी सोच के दायरे में
तुम्हें सीमित करने की
कोशिश ही
मेरी सबसे बड़ी भूल थी
आज इस भूल का
परिष्कार करता हूँ
तुम जैसी हो
तुम्हें वैसी ही
स्वीकार करता हूँ।
Wherever you go, go with all your heart. Everyday is a gift, that’s why they call it the present.
Friday, July 7, 2017
भूल
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