Friday, July 7, 2017

भूल

ये भूल थी मेरी
सीमित करना चाहता था
तुम्हें
नियंत्रित करना चाहता था
तुम्हारी स्वच्छंद उड़ान को
एक परिभाषा में
क़ैद करना चाहता था
तुम्हारे क़िरदार को
लपेटना चाहता था तुम्हें
परंपराओं की मोटी चादर में
बांधना चाहता था
तुम्हारी खुशबुओं को
ढालना चाहता था तुम्हें
एक सांचे में
मगर,
ऐसा हुआ है कभी?
बांध सका है
कोई हवा को?
क़ैद कर सका है
कोई गुलों की खुशबू?
तुम अप्रतिम हो,
शाश्वत हो, शुद्ध हो
तुम्हारा क़िरदार
किसी परिभाषा में नहीं
बांधा जा सकता
अपनी सोच के दायरे में
तुम्हें सीमित करने की
कोशिश ही
मेरी सबसे बड़ी भूल थी
आज इस भूल का
परिष्कार करता हूँ
तुम जैसी हो
तुम्हें वैसी ही
स्वीकार करता हूँ।

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