Tuesday, December 24, 2013

प्रयास

जो खो गया वो अतीत था
जो मिल रहा वो अज़ीज है
वो आह थी जो गुज़र गयी
ये सांस है जो मरीज़ है
ये महफ़िलें हैं अजीब सी
यहाँ ख़ामोशी  ही तमीज है 
किरदारों ने कर लिए समझौते
दिखावे को लड़ कमीज़ है!

Thursday, November 28, 2013

मुझे भी तितली बनना है

कितने रंग हैं तितली के  परों पर
बैंगनी, नीला, आसमानी,  हरा, पीला
नारंगी और लाल
इन सारे इंद्रधनुषी रंगों का सम्मिलित
और समेकित प्रभाव
एक अलौकिक सम्मोहन एवं
आकर्षण उत्पन्न करता है
फलतः जीवन-यात्रा तनिक ज्यादा
प्रवाहपूर्ण, रसपूर्ण और उद्देश्यसिक्त
बन जाती है
लेकिन, इन रंगों में महज़
इंद्रधनुषी रंगों की  छटा ही नहीं
गौर से देखने पर कतिपय
श्याम और धूसर रंग की  परत भी
साफ़ दिखती है
लेकिन, तितली इनके भार से
दब जाने के बजाय
इन्हें इंद्रधनुषी रंगों के वलय में ही
समेकित कर लेती है
और, इस एकीकृत पहचान के साथ
नवीन ऊर्जा और उत्साह का
संचार करती रहती है
इस फूल से उस फूल
मुझे भी तितली बनना है
अपने दुखों, अभावों, कुंठाओं
और नैराश्य-सिक्त धूसर रंग को
अपनी ऊर्जा, उदात्तता, प्रेम
और अपनेपन के इंद्रधनुषी रंग में
मिलाकर एक समेकित और
संश्लेषित छवि बनाना है
और उड़ते जाना है
बस..... उड़ते जाना!

मेरे जज़बात

हरी घास पर जमी 
नन्हीं-२ ओस की बूंदें 
मानो मेरे जज़बात ही 
जमकर बिखर गए हों 
ओस की शक्ल में !

शुक्रिया!

शुक्रिया!
मुझे चलना सिखाने के लिए
उड़ना सिखाने के लिए
गिरकर, संभलना सिखाने के लिए
अब मुक्त कर दो  मुझे
चलने दो अनदेखी-अनजानी राहों पर
उड़ने दो मुक्त गगन में
बहने दो निर्झर की तरह
गले लगाने दो समंदर को
तय करने दो तमाम फासले
आखिर,ये मेरे हौसले की ही नहीं
तुम्हारी सीख की भी कसौटी है !

तुम ज़मीं हो मेरी

तुम ज़मीं हो मेरी

मेरी उम्मीदें आसमां के आर-पार

तैरती हैं

मगर, इनको पूरा करने का हौसला

और इस हौसले की जड़

तुममे ही है

मुझे उड़ने से मत रोकना

मगर, जब उड़ान के बाद

वापस लौटूं तो मुझे

मेरी ज़मीं से वंचित न करना

थाम लेना , अपना लेना मुझे

फिर से !!

Friday, August 9, 2013

Meri Tanhai

एक लम्बा और उलझनों भरा सफ़र
तय करके जब पहुंचा मंजिल के करीब
तो देखा, मेरी अज़ीज़ दोस्त
वहां पहले से ही मौजूद थी
उसने गर्मजोशी से मेरा
इस्तकबाल किया, गले से लगाया
दरअसल, मेरी तन्हाई हमेशा मुझसे
कुछ कदम तेज चलती।

Monday, April 22, 2013

रेत पर पानी से प्यार लिखता हूँ

 रेत पर पानी से प्यार लिखता हूँ
हवा के माथे पर इक़रार लिखता हूँ
शाम जब रात से गले मिलती है
झूम कर उल्फत के अशआर लिखता हूँ
उन्मादी शोर से जब उठता है धुआं
बदहवाश बेखयाल बेकार लिखता हूँ
जब अपने ही खयालों में छिड़ती है जंग
चेहरे के मुख्तलिफ किरदारों की तकरार लिखता हूँ
बात करनी भी मुश्किल हो जहाँ
उसे खौफ की सरकार लिखता हूँ
जिस गुल से आती वफ़ा की खुशबू न हो
उस गुल को गुल नहीं खार लिखता हूँ
आपकी बेरुखी से कोई शिकवा न गिला
मैं खुद को ही कुसूरवार लिखता हूँ।