Thursday, November 28, 2013

शुक्रिया!

शुक्रिया!
मुझे चलना सिखाने के लिए
उड़ना सिखाने के लिए
गिरकर, संभलना सिखाने के लिए
अब मुक्त कर दो  मुझे
चलने दो अनदेखी-अनजानी राहों पर
उड़ने दो मुक्त गगन में
बहने दो निर्झर की तरह
गले लगाने दो समंदर को
तय करने दो तमाम फासले
आखिर,ये मेरे हौसले की ही नहीं
तुम्हारी सीख की भी कसौटी है !

No comments:

Post a Comment