रेत पर पानी से प्यार लिखता हूँ
हवा के माथे पर इक़रार लिखता हूँ
शाम जब रात से गले मिलती है
झूम कर उल्फत के अशआर लिखता हूँ
उन्मादी शोर से जब उठता है धुआं
बदहवाश बेखयाल बेकार लिखता हूँ
जब अपने ही खयालों में छिड़ती है जंग
चेहरे के मुख्तलिफ किरदारों की तकरार लिखता हूँ
बात करनी भी मुश्किल हो जहाँ
उसे खौफ की सरकार लिखता हूँ
जिस गुल से आती वफ़ा की खुशबू न हो
उस गुल को गुल नहीं खार लिखता हूँ
आपकी बेरुखी से कोई शिकवा न गिला
मैं खुद को ही कुसूरवार लिखता हूँ।
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