Wednesday, August 29, 2012

Sochta Hun Thoda Rumani Ho Jaun

सोचता हूँ 
कुछ पल के लिए ही सही 
चीजों को एक अलग नज़रिए से 
देखने की कोशिश करूँ 
सामने खड़े सूखे-बदसूरत पेड़ पर 
झल्लाने के बजाय 
उसकी पतली, हवा में लहराती 
टहनी पर पूरब की ओर 
मुंह करके बैठे मैना-युगल को 
देखूं और, मुस्कुराने से 
खुद को न रोकूँ 
ऊँगली में चुभे कांटे को 
कोसने के बजाय 
उसके बिलकुल पास ही खिले हुए 
पीले गुलाब को देखूं और 
बगैर कोई आहट  किये 
उसे हौले से स्पर्श करूँ 
कमरे के वास्तु से लेकर 
टूटे फर्नीचर पर आँख 
तरेरने के बजाय 
पश्चिम की दीवार पर टंगी  
उस पुरानी पेंटिंग को देखूं 
जिसपर लिखा है-
'कोशिशें कामयाब ज़रूर होती हैं'
यादों  के शहर में घूमते हुए 
तानों-उलाहनों, विछोह और उदासी 
के पन्नों को परे रखकर 
उस पन्ने को खोलूं जिसमें-
हमारे  प्रथम मिलन,  संश्लिष्ट 
तप्त  सांसों और तेज धडकनों 
का ब्यौरा दर्ज है 
बोझिल -मनहूस शाम के 
दर पर बैठकर उदास 
होने के बजाय 
आगामी सुबह की चमकती 
हुई देहरी पर सफ़ेद उजाले में 
खुद को तर-ओ-ताज़ा महसूस 
करूँ 
जल रहित और निरर्थक 
गर्जन-तर्जन युक्त 
कारे -कजरारे  मेघों को देखकर 
निराश होने के बजाय 
इनकी अनियंत्रित और उद्दंड 
भागादौड़ी से गगन में निर्मित
 होने वाली उन अनेक अद्भुत और 
 मनोहारी चित्राकृतियों को देखकर 
मन को उन्हीं के साथ घूमने  के 
लिए स्वतंत्र छोड़ दूँ 
सोचता हूँ,
तनिक हंसूं , मुस्कुराऊँ, इतराऊँ 
आज मैं भी 
थोडा रूमानी हो जाऊं .......!!

 

Sunday, August 26, 2012

Smriti Ke Jivashm

स्मृति के जीवाश्म 
स्मृति की एक नाजुक सी 
पगडण्डी पर चलते हुए 
अनायास, मैं जा पहुंचा 
एक अँधेरी-वीरान गुफा में
कुछ भी सूझता नहीं था 
सिवाय निविड़ अंधकार के 
 आँखों को खोले रखना 
या बंद कर  लेना 
बराबर था 
कुछ देर, यूँ ही खड़ा रहा 
अन्यमनस्क, प्रस्तर-मूर्ति सा 
सहसा, एक कमजोर सा
पीला प्रकाश-पुंज
गुफा के एक गवाक्ष से 
प्रस्फुटित हुआ 
और, उसके धुंधले उजाले में 
मैंने पूरी सामर्थ्य से 
अपने परितः देखने और 
महसूस करने की कोशिश की 
अरे .........!!
यहाँ तो मेरे सारे  बीते हुए 'कल' 
उपस्थित थे 
बचपन से यौवन का 
सम्पूर्ण लेखा-जोखा 
सारे उल्लास, सारे उत्सव 
सारी मुस्कुराहटें, सारा उन्माद 
सब यहाँ थीं 
सारी असफलताएं 
सभी अवरोध 
और उनसे दो-चार 
होने की कहानी 
ताने-उलाहने 
रूठने-मनाने के किस्से 
कुछ गरम सांसें 
कुछ तेज धडकनें 
सारी बेक़रारियां 
सारे इंतज़ार 
झूठी टकराहटें 
बेमानी तक़रार 
 अधूरा मिलन ........
मगर, सच्चा प्यार 
सब कुछ तो यहाँ था 
अब मैं इनको स्पष्ट 
देख और महसूस 
कर पा रहा था 
यादें घनीभूत होकर 
जम गईं थीं यहाँ 
और, अब जान पाया मैं 
ये मेरी ही 
'स्मृतियों के जीवाश्म ' थे...!!      
 
 

Friday, August 24, 2012

गणित 
मैं हमेशा गणित का एक 
औसत विद्यार्थी रहा हूँ 
जो साधारण गुणा-भाग 
जोड़ और घटाने  से ज्यादा 
कभी आगे नहीं बढ़ सका 
लेकिन...... 
तुम्हारा व्यक्तित्व मेरे समक्ष
गणित की एक बहुत ही क्लिष्ट  
पहेली की तरह उपस्थित हुआ 
जिसे हल करने की कोशिश 
तो मैं रोज़ करता हूँ 
लेकिन सफल नहीं हो पाता 
हालांकि.............
मैं सफल हो भी सकता हूँ 
 अगर तुम इस पहेली को 
हल करने में 
मेरी तनिक मदद करो 
 क्योंकि , मैं जानता हूँ 
तुम, गणित में 
मेरी तरह 'कमज़ोर' नहीं हो...!!

Tuesday, August 21, 2012

बारिश 
कितनी अजीब है 
ये बारिश भी 
शहर-गाँव 
खेत-खलिहान 
गलियां-सड़कें 
सबको भिगो दिया 
सर से पांव तक 
सराबोर होने के बावज़ूद 
मन का हरएक कोना 
तरस रहा है.......
काश! एक बूंद उसे भी 
मिल जाती तो 
बरसों की जमी हुई धूल 
कुछ तो साफ़ होती 
शायद कोई नया 
अंकुर पनपता .......!!

मेरा जीवन 
मेरा जीवन खुली किताब नहीं है 
इसके कुछ पन्ने गायब हैं 
कुछ स्वच्छ हैं 
कुछ स्याह हैं 
कहीं भाषा क्लिष्ट है 
कहीं वर्तनी की अशुद्धि 
कहीं व्याकरण-दोष 
तो कहीं लिपि अबूझ 
बहरहाल,
अभी भी कुछ पृष्ठ 
कोरे बचे हुए हैं 
जिनपर मैं 
कुछ ऐसा लिखने की 
कोशिश कर रहा हूँ 
जो कम-से-कम 
मेरे लिए तो बोधगम्य हो........!!

Monday, August 20, 2012

काश 
ज़माने की बुतपरस्ती 
देखकर 
दिल करता है 
काश! हम भी 
पत्थर ही होते.........!!
अन्तर्विरोधों का सामंजस्य 
वो खुश नहीं है 
पर मुस्कुराता है 
दिल में वीरानी है मगर 
महफ़िल में गाता है 
उसके लिए 
'अन्तर्विरोधों का सामंजस्य'
ही जीवन है .....................!!
आकाश-कुसुम 
वो शहर 
शहर  की वो गली 
नुक्कड़ पर वो मंदिर 
और गली के आखिरी छोर पर 
वो मकान 
सब वहीं हैं 
बस......
वो एहसास 
वो विश्वास 
वो  लड़ाइयां 
वो तकरार 
वो भोली सी मनुहार 
वो हंसी 
वो मुस्कुराहट 
वो मासूम खिलखिलाहट 
वहां होकर भी 
मेरे  'आकाश-कुसुम '
बन गयी है.................!!
घर 
यूँ  उसे भी अच्छा लगता है 
घर जाना-बोलना- बतियाना
लेकिन.....
ईंट-पत्थरों की दीवारों पर 
लदी छत  को ही तो 
घर नहीं कहते.............!!!