ये भूल थी मेरी
सीमित करना चाहता था
तुम्हें
नियंत्रित करना चाहता था
तुम्हारी स्वच्छंद उड़ान को
एक परिभाषा में
क़ैद करना चाहता था
तुम्हारे क़िरदार को
लपेटना चाहता था तुम्हें
परंपराओं की मोटी चादर में
बांधना चाहता था
तुम्हारी खुशबुओं को
ढालना चाहता था तुम्हें
एक सांचे में
मगर,
ऐसा हुआ है कभी?
बांध सका है
कोई हवा को?
क़ैद कर सका है
कोई गुलों की खुशबू?
तुम अप्रतिम हो,
शाश्वत हो, शुद्ध हो
तुम्हारा क़िरदार
किसी परिभाषा में नहीं
बांधा जा सकता
अपनी सोच के दायरे में
तुम्हें सीमित करने की
कोशिश ही
मेरी सबसे बड़ी भूल थी
आज इस भूल का
परिष्कार करता हूँ
तुम जैसी हो
तुम्हें वैसी ही
स्वीकार करता हूँ।
Wherever you go, go with all your heart. Everyday is a gift, that’s why they call it the present.
Friday, July 7, 2017
भूल
Thursday, July 6, 2017
I May Not Be That Wise
You just can't judge
Dreams by their size
Your aura and
Scintillating charm
Is flowing
Through my eyes
Oh my angel!
I'm drowning in
The ocean of your
Adorable love for
I may not be
That wise.
Wednesday, February 15, 2017
यादों का सरमाया
बात पूरी भी न की उठ के चल दिए,
तुम मौसम तो न थे फिर भी बदल गए।
गुलों में रंग-ओ-बू सब तुम्हीं से थी,
गए तुम तो सब हवा के संग गए।
मंज़िल तुम्हारा दर था रस्ते तुम्हारी गलियां,
हम जाते तो कहाँ जाते रहगुज़र के हो लिये।
यादों का सरमाया ही अब पास है मेरे,
फिरता हूँ हर क़दम दिल में सफर लिए।
Friday, February 19, 2016
गौरैया और मैं
ज़माने की रफ़्तार में कहीं
पीछे छूट गया मैं
विकास का पहिया
बहुत द्रुत गति से घुमा
और मैं उसके गर्द-ओ-ग़ुबार में
खो सा गया
मेरे घर का तीन-चौथाई हिस्सा
आज भी मिट्टी, खपरैल और
फूस की छप्पर से बना है
हाँ मगर, इस खपरैल की छत
और फूस की छप्पर में आज भी
गौरैया अपना घोसला बनाती है
कदाचित् ये गौरैया भी विकास की
दौड़ में कहीं पीछे छूट गयी है
मेरी तरह
लेकिन मुझे तो एक साथी मिल गया है
इस पिछड़ी हुई गौरैया के रूप में।
पीछे छूट गया मैं
विकास का पहिया
बहुत द्रुत गति से घुमा
और मैं उसके गर्द-ओ-ग़ुबार में
खो सा गया
मेरे घर का तीन-चौथाई हिस्सा
आज भी मिट्टी, खपरैल और
फूस की छप्पर से बना है
हाँ मगर, इस खपरैल की छत
और फूस की छप्पर में आज भी
गौरैया अपना घोसला बनाती है
कदाचित् ये गौरैया भी विकास की
दौड़ में कहीं पीछे छूट गयी है
मेरी तरह
लेकिन मुझे तो एक साथी मिल गया है
इस पिछड़ी हुई गौरैया के रूप में।
Wednesday, June 4, 2014
बड़े से बड़ा सुख भी
एक छोटे से दुख को
बेदखल नहीं कर सकता
दुख का वजूद
कायम रहता है
सुख के समानांतर
एक दुख को
दूसरा दुख ही
बेदखल करता है
परत दर परत
दुख की सतह
मोटी होती जाती है हम प्रायः सबसे
ऊपरी सतह से
जूझते रहते हैं
सुख तो तात्कालिक और
अस्थाई होता है
अतिशीघ्र वाष्पित
हो जाता है
जबकि दुख ठोस
और स्थायी होता है
घनीभूत होकर
जम जाता है
संवेदना की जमीन पर.
बड़े से बड़ा सुख भी
एक छोटे से दुख को
बेदखल नहीं कर सकता
दुख का वजूद
कायम रहता है
सुख के समानांतर
एक दुख को
दूसरा दुख ही
बेदखल करता है
परत दर परत
दुख की सतह
मोटी होती जाती है हम प्रायः सबसे
ऊपरी सतह से
जूझते रहते हैं
सुख तो तात्कालिक और
अस्थाई होता है
अतिशीघ्र वाष्पित
हो जाता है
जबकि दुख ठोस
और स्थायी होता है
घनीभूत होकर
जम जाता है
संवेदना की जमीन पर.
बड़े से बड़ा सुख भी
एक छोटे से दुख को
बेदखल नहीं कर सकता
दुख का वजूद
कायम रहता है
सुख के समानांतर
एक दुख को
दूसरा दुख ही
बेदखल करता है
परत दर परत
दुख की सतह
मोटी होती जाती है हम प्रायः सबसे
ऊपरी सतह से
जूझते रहते हैं
सुख तो तात्कालिक और
अस्थाई होता है
अतिशीघ्र वाष्पित
हो जाता है
जबकि दुख ठोस
और स्थायी होता है
घनीभूत होकर
जम जाता है
संवेदना की जमीन पर.
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