तपते दिन हैं लम्बी रातें
साहिल से मझधार की बातें
आखिर वक़्त बहा ले जाता
हम बालू के महल बनाते
हर कोई शायर था जहां
ऐसे में हम क्या सुनाते
साक़ी ने जब फेर लीं नज़रें
मयखाने में हम क्या जाते
लाख रहे वो दूर मगर
खयालों में हैं आते-जाते
जी लेते इक उम्र तभी हम
शरमा के वो नज़र झुकाते।।
साहिल से मझधार की बातें
आखिर वक़्त बहा ले जाता
हम बालू के महल बनाते
हर कोई शायर था जहां
ऐसे में हम क्या सुनाते
साक़ी ने जब फेर लीं नज़रें
मयखाने में हम क्या जाते
लाख रहे वो दूर मगर
खयालों में हैं आते-जाते
जी लेते इक उम्र तभी हम
शरमा के वो नज़र झुकाते।।
bahut umda.......
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