Saturday, April 6, 2013

तपते दिन हैं लम्बी रातें

तपते दिन हैं लम्बी रातें
साहिल से मझधार की बातें 
आखिर वक़्त बहा ले जाता 
हम बालू के महल बनाते 
हर कोई शायर था जहां 
ऐसे में हम क्या सुनाते 
साक़ी ने जब फेर लीं नज़रें 
मयखाने में हम क्या जाते 
लाख रहे वो दूर मगर 
खयालों में हैं आते-जाते 
जी लेते इक उम्र तभी हम 
शरमा के वो नज़र झुकाते।।

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