Monday, April 22, 2013

रेत पर पानी से प्यार लिखता हूँ

 रेत पर पानी से प्यार लिखता हूँ
हवा के माथे पर इक़रार लिखता हूँ
शाम जब रात से गले मिलती है
झूम कर उल्फत के अशआर लिखता हूँ
उन्मादी शोर से जब उठता है धुआं
बदहवाश बेखयाल बेकार लिखता हूँ
जब अपने ही खयालों में छिड़ती है जंग
चेहरे के मुख्तलिफ किरदारों की तकरार लिखता हूँ
बात करनी भी मुश्किल हो जहाँ
उसे खौफ की सरकार लिखता हूँ
जिस गुल से आती वफ़ा की खुशबू न हो
उस गुल को गुल नहीं खार लिखता हूँ
आपकी बेरुखी से कोई शिकवा न गिला
मैं खुद को ही कुसूरवार लिखता हूँ।

Saturday, April 6, 2013

तपते दिन हैं लम्बी रातें

तपते दिन हैं लम्बी रातें
साहिल से मझधार की बातें 
आखिर वक़्त बहा ले जाता 
हम बालू के महल बनाते 
हर कोई शायर था जहां 
ऐसे में हम क्या सुनाते 
साक़ी ने जब फेर लीं नज़रें 
मयखाने में हम क्या जाते 
लाख रहे वो दूर मगर 
खयालों में हैं आते-जाते 
जी लेते इक उम्र तभी हम 
शरमा के वो नज़र झुकाते।।