Wednesday, October 24, 2012

Chalna kab tak

शाम की उंगली पकड़ के 
 फिर लौटा हूँ घर 
दिन भर महफ़िल में था 
लोगों के चेहरे देखकर 
अपने चेहरे का भाव 
तय किया 
पर, अब रात आ रही है 
रात में मै खुद के साथ 
होता हूँ 
बगैर किसी आवरण के 
मेघ-रहित बादल  की तरह 
महफ़िल के दोस्तों !!
मेरी असलियत शाम के 
साथ खुलती है 
और रात भर निर्विकार 
निर्दोष रहती है 
सुबह से मैं फिर उसी 
दौड़ में शामिल हो
जाता हूँ  जिसमें, मालूम 
नहीं, चलना कब तक है 
पहुंचना कहाँ है ?

Ek Daur Aisa Bhi

ऐसा भी एक दौर आया 
जीवन में 
जब सोचने पर मजबूर 
हुआ कि 
क्या मेरे लिए सफ़र 
जारी रख पाना 
मुमकिन होगा ?
उस 'यथार्थबोध' ने 
मानो तिमिर के गहरे 
कूप में धकेल दिया था 
अचानक, दुनिया बेहद 
अजनबी और भयावह 
लगने लगी थी 
रंग, आँखों में मानो 
चुभने से लगे थे 
संगीत, महज़ शोर 
लगने लगा था 
आज, मुझमे हिम्मत है 
सच कहने की -
और सच ये है कि 
सफ़र से तौबा करने का 
फैसला मैंने कर ही 
तो लिया था .......
मगर, ऐसा नहीं होना था 
उस घनघोर तिमिर से 
एक किरण निकली 
उस शोर से एक मधुर 
सुर-तरंग प्रकट हुई 
मैंने अपने कंधे पर 
एक स्नेहिल-कोमल 
स्पर्श महसूस किया 
आँख खुली तो पार्श्व में 
'वो' थी 
उसकी आँखें नव-आशा, 
नव-जीवन से परिपूर्ण थीं 
उसका अस्तित्व 
स्फूर्ति का जाग्रत पुंज 
प्रतीत होता था 
उसको देखकर 
मेरे वजूद में मानो 
नवीन उत्साह प्रवाहित 
होने लगा 
मैंने स्वयं को पुनर्नवा 
महसूस किया 
कुछ बोलने के लिए 
मेरे होंठ हिले भर थे कि 
उसने अपने दांये हाथ 
की दो उंगलियाँ मेरे 
होंठों पर रख दी 
फिर अपने स्नेहासिक्त 
हाथों में मेरा हाथ 
लेकर कहा 
"आओ, चलते हैं "
"सफ़र कभी अधूरा 
छोड़ते हैं भला "? उसने 
कहा था 
और मैं .....
मृत अतीत को पीछे 
छोड़कर 
अनंत  भविष्य के 
अनजाने पथ पर 
मानो, मंत्रमुग्ध सा 
चल पड़ा, 
उसके साथ-साथ .....!!

Wednesday, October 3, 2012

Aansu Nahin, Pani

उसे नफरत की हद तक 
चिढ़ थी, आंसू बहाने से 
जब दिल टूटा 
कतार में पीछे छूटा 
जब बेहद क़रीबी लोग 
बेहद दूर हो गए 
हसीं-रूमानी ख्वाब 
शीशे की मानिंद 
चकनाचूर हो गए 
'यार' ने दुनियादारी की 
दुहाई देकर मुहं फेर लिया 
रास्तों ने भी बेरुखी दिखाई 
और मंजिल ने रुख 
बदल लिया 
ऐसे में, हर बार 
आँखें नम हो आईं 
और कुछ बूंदें 
पलकों की देहरी लाँघ कर 
गालों पर आ गईं 
 उसने हर बार खुद को 
शर्मिंदा महसूस किया 
मगर,  ये तय नहीं कर सका 
कि ये शर्मिंदगी 
पराजित होने की थी 
या आंसुओं को बहने से 
ना रोक पाने की 
और फिर उसने खुद को 
दिलासा-सा देते हुए 
मन-ही-मन 
निर्णय किया कि 
"ये आँसू नहीं हैं 
महज पानी हैं"!!!

Sampoorn Adhoorapan

आरम्भ से ही 
तलाश थी  
सम्पूर्णता की 
प्यार,
समर्पण ,
आनंद ,
उल्लास ,
अधिकार ,
ज़िम्मेदारी,
विचार,
कार्य-व्यापार 
सबकुछ, सम्पूर्णता में चाहा 
मगर, 
ये तलाश पूरी हुई 
अधूरेपन में 
 मुझे मिला है 
'सम्पूर्ण अधूरापन' !!