शाम की उंगली पकड़ के
फिर लौटा हूँ घर
दिन भर महफ़िल में था
लोगों के चेहरे देखकर
अपने चेहरे का भाव
तय किया
पर, अब रात आ रही है
रात में मै खुद के साथ
होता हूँ
बगैर किसी आवरण के
मेघ-रहित बादल की तरह
महफ़िल के दोस्तों !!
मेरी असलियत शाम के
साथ खुलती है
और रात भर निर्विकार
निर्दोष रहती है
सुबह से मैं फिर उसी
दौड़ में शामिल हो
जाता हूँ जिसमें, मालूम
नहीं, चलना कब तक है
पहुंचना कहाँ है ?