Friday, February 14, 2020

भाषा का आविष्कार

भाषा का आविष्कार
प्रेम या घृणा को अभिव्यक्त करने
के लिए नहीं हुआ था।
सेपियन्स के आदिपूर्वज
जब वे आखेटक-संग्राहक अवस्था में ही थे
भाषा या लिपि के अभाव में भी
अपनी भावनाओं को सहज ही 
संप्रेषित कर पाते थे।
शरीर की अनेकानेक भाव-भंगिमाएं
लिखित भाषा के बिना भी
संचार के लिए पर्याप्त होती थीं।
फिर, शनैःशनैः विकास के क्रम में
व्यापार-वाणिज्य-विनिमय
के आदि-रूप का अभ्युदय हुआ।
इनके सहज संचालन के लिए
अब तक का सरल और अलिखित
संचार अपर्याप्त लगने लगा।
व्यापारिक-वाणिज्यिक लेनदेन
और इनके नियमों-शर्तों को 
सरंक्षित और स्थाई बनाने के लिए
लिपि का अविष्कार हुआ
और ये आविष्कार अचानक न होकर
कई सदियों में आकार ले सका।
मानव सभ्यता क्रमिक रूप से आगे बढ़ती रही
कुछ बारह हज़ार वर्ष पहले
आखेटक-संग्राहक अवस्था से
मानव कृषक-अवस्था में पहुँचता है।
सभ्यता के विकास-क्रम में इसे ही
"प्रथम कृषि-क्रांति" कहा जाता है।
तब से औद्योगिक-क्रांति के कई चरणों
से गुज़रते हुए आज हम
सेपियन्स के वर्तमान वंशज
सभ्यता-संस्कृति के निरंतर
निर्माण-परिष्कार-संवर्धन के रथ पर सवार
पहुँच गए हैं इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में।
आज का सारा ज्ञान-विज्ञान, व्यापार-वाणिज्य
साहित्य-संगीत, कला-संस्कृति
वैयक्तिक-सार्वजनिक संचार
सबकुछ भाषा पर ही निर्भर है।
भाषा और लिपि इन सबके लिए
अनिवार्य-अपरिहार्य है।
लेकिन, चूँकि, जैसा कि मैंने शुरुआत में कहा था,
"भाषा का अविष्कार
प्रेम या घृणा को अभिव्यक्त करने 
के लिए नहीं हुआ था।"
इसलिए, आज भी प्रेम या घृणा को
पूरी तरह व्यक्त करने में
दुनिया की कोई भी भाषा 
स्वयं को समर्थ नहीं पाती।
हम लाख प्रेमगीत या
शिकायती-पत्र लिख लें
शायद ही अपनी भावनाओं को 
विशुद्ध रूप से संप्रेषित कर पाते हैं।
इसके विपरीत सहज ही 
नैनों से नैन मिलते हैं और
संचार पूर्ण हो जाता है
हाथों से हाथों का स्पर्श होता है
और भावनाएं संप्रेषित हो जाती हैं
बिना किसी भाषा के बिना किसी बाधा के।
लगता है हमें अपनी सहज-सरल-जन्मजात
भाषा-लिपि रहित सम्प्रेषण क्षमता को
निखारने-सवांरने पर और अधिक 
ध्यान देने की आवश्यकता है।
नैनों के मिलन और हाथों के स्पर्श
की भाषा को और अधिक स्वीकार्य
बनाने की आवश्यकता है।

Friday, February 7, 2020

पलाश के फूल, नदी और साइबेरियाई प्रवासी

जब हम मिले थे पहली बार
यहाँ पलाश का एक जंगल हुआ करता था
उससे होकर एक नदी बहती थी
सर्दियों के मौसम में सुदूर साइबेरिया से
पक्षियों के समूह प्रवास करने आते थे
इस मनोरम आर्द्र भूमि में
इनके बीच हमारा संबंध पुष्पित-पल्लवित
होता गया
बरस-दर-बरस टेसू के फूलों और
साइबेरियाई प्रवासियों ने 
हमारे बीच ऊर्जा और उत्साह का संचार किया
मैं ख़ुद को सौभाग्यशाली समझता था
तुम्हारे साहचर्य, पलाश के जंगल
जंगल से गुजरती नदी और
साइबेरियाई प्रवासियों के बीच
फिर एक दिन अचानक
तुमने जाने का निर्णय ले लिया
मुझे छोड़कर, इन सब को छोड़कर
मैंने तुम्हारे जाने की वज़ह नहीं पूछी
हालाँकि, मैं जानना चाहता था
तुम्हारे जाने के बरस मैंने अनुभव किया
पलाश के पेड़ों पर कुछ कम फूल आये थे
नदी का प्रवाह भी तनिक मंद हो गया था
साइबेरियाई प्रवासी कुछ अनमने-उद्विग्न से थे
मैं वहीं ठहर गया था और देखा किया
बरस-दर-बरस पलाश के फूलों का कम होते जाना
नदी के प्रवाह और साइबेरियाई प्रवासियों 
की संख्या का निरंतर और क्रमिक 
रूप से न्यून होते जाना
तुम्हें गए कई बरस हो गए हैं
अब यहाँ जंगल में
नदी भी सूख गई है
हालाँकि उसके निशान अब भी बाकी हैं
साइबेरियाई प्रवासी भी अब नहीं आते
आज के अख़बार में एक ख़बर छपी है
"वैश्विक तापन के कारण इस क्षेत्र में
बहने वाली एक नदी सूख गयी,
पलाश के जंगल नष्ट हो गए
और साइबेरियाई पक्षियों ने आना बंद कर दिया है।"
पूरी दुनिया इस अख़बारी ख़बर से
सहमत है, सिवाय मेरे।
आज भी मुझे लगता है
जिस दिन तुम वापस आ जाओगी
ये पलाश का जंगल फिर से हरा हो जाएगा
नदी फिर से प्रवाहित होने लगेगी
फिर से आने लगेंगे साइबेरियाई प्रवासी
मेरे लिए न सही
एक बार तुम्हे वापस आना चाहिए
इन सब के लिए।