Friday, February 19, 2016

गौरैया और मैं

ज़माने की रफ़्तार में कहीं
पीछे छूट गया मैं
विकास का पहिया
बहुत द्रुत गति से घुमा
और मैं उसके गर्द-ओ-ग़ुबार में
खो सा गया
मेरे घर का तीन-चौथाई हिस्सा
आज भी मिट्टी, खपरैल और
फूस की छप्पर से बना है
हाँ मगर, इस खपरैल की छत
और फूस की छप्पर में आज भी
गौरैया अपना घोसला बनाती है
कदाचित् ये गौरैया भी विकास की
दौड़ में कहीं पीछे छूट गयी है
मेरी तरह
लेकिन मुझे तो एक साथी मिल गया है
इस पिछड़ी हुई गौरैया के रूप में।

Wednesday, June 4, 2014

बड़े से बड़ा सुख भी एक छोटे से दुख को बेदखल नहीं कर सकता दुख का वजूद कायम रहता है सुख के समानांतर एक दुख को दूसरा दुख ही बेदखल करता है परत दर परत दुख की सतह मोटी होती जाती है हम प्रायः सबसे ऊपरी सतह से जूझते रहते हैं सुख तो तात्कालिक और अस्थाई होता है अतिशीघ्र वाष्पित हो जाता है जबकि दुख ठोस और स्थायी होता है घनीभूत होकर जम जाता है संवेदना की जमीन पर.
बड़े से बड़ा सुख भी एक छोटे से दुख को बेदखल नहीं कर सकता दुख का वजूद कायम रहता है सुख के समानांतर एक दुख को दूसरा दुख ही बेदखल करता है परत दर परत दुख की सतह मोटी होती जाती है हम प्रायः सबसे ऊपरी सतह से जूझते रहते हैं सुख तो तात्कालिक और अस्थाई होता है अतिशीघ्र वाष्पित हो जाता है जबकि दुख ठोस और स्थायी होता है घनीभूत होकर जम जाता है संवेदना की जमीन पर.
बड़े से बड़ा सुख भी एक छोटे से दुख को बेदखल नहीं कर सकता दुख का वजूद कायम रहता है सुख के समानांतर एक दुख को दूसरा दुख ही बेदखल करता है परत दर परत दुख की सतह मोटी होती जाती है हम प्रायः सबसे ऊपरी सतह से जूझते रहते हैं सुख तो तात्कालिक और अस्थाई होता है अतिशीघ्र वाष्पित हो जाता है जबकि दुख ठोस और स्थायी होता है घनीभूत होकर जम जाता है संवेदना की जमीन पर.

Tuesday, December 24, 2013

प्रयास

जो खो गया वो अतीत था
जो मिल रहा वो अज़ीज है
वो आह थी जो गुज़र गयी
ये सांस है जो मरीज़ है
ये महफ़िलें हैं अजीब सी
यहाँ ख़ामोशी  ही तमीज है 
किरदारों ने कर लिए समझौते
दिखावे को लड़ कमीज़ है!

Thursday, November 28, 2013

मुझे भी तितली बनना है

कितने रंग हैं तितली के  परों पर
बैंगनी, नीला, आसमानी,  हरा, पीला
नारंगी और लाल
इन सारे इंद्रधनुषी रंगों का सम्मिलित
और समेकित प्रभाव
एक अलौकिक सम्मोहन एवं
आकर्षण उत्पन्न करता है
फलतः जीवन-यात्रा तनिक ज्यादा
प्रवाहपूर्ण, रसपूर्ण और उद्देश्यसिक्त
बन जाती है
लेकिन, इन रंगों में महज़
इंद्रधनुषी रंगों की  छटा ही नहीं
गौर से देखने पर कतिपय
श्याम और धूसर रंग की  परत भी
साफ़ दिखती है
लेकिन, तितली इनके भार से
दब जाने के बजाय
इन्हें इंद्रधनुषी रंगों के वलय में ही
समेकित कर लेती है
और, इस एकीकृत पहचान के साथ
नवीन ऊर्जा और उत्साह का
संचार करती रहती है
इस फूल से उस फूल
मुझे भी तितली बनना है
अपने दुखों, अभावों, कुंठाओं
और नैराश्य-सिक्त धूसर रंग को
अपनी ऊर्जा, उदात्तता, प्रेम
और अपनेपन के इंद्रधनुषी रंग में
मिलाकर एक समेकित और
संश्लेषित छवि बनाना है
और उड़ते जाना है
बस..... उड़ते जाना!

मेरे जज़बात

हरी घास पर जमी 
नन्हीं-२ ओस की बूंदें 
मानो मेरे जज़बात ही 
जमकर बिखर गए हों 
ओस की शक्ल में !