Monday, September 16, 2024

सो जाता हूं

रोज़ - रोज़ ओस की बूंदें
स्वप्न भरे हों पलकें मूंदें 
जीवन - पथ पर भागदौड़ में
चाहे जितना उछलें - कूदें
दिन भर की आपाधापी में खो जाता हूं
शाम ढले जब घर जाता हूं सो जाता हूं