Friday, December 27, 2019

नाकारा मसीहा

घर वैसे भी काफी पुराना था
जीर्ण-शीर्ण प्रायः वीरान
उदासियों-उपेक्षाओं को
दीवारों के कोनों और पर्दों
की सलवटों में छुपाये हुए
मैं जब अंदर दाख़िल हुआ
तो मेरा स्वागत एक
आदिम मगर जिजीविषा से
भरी मुस्कुराहट ने किया
जो अभी भी जीवित थी
वीरानियों के साम्राज्य को
चुनौती-सी देती हुई
मेरा दिल बैठने ही वाला था
कि उसने धीरे से मुझे छुआ
और पूरी शक्ति से अपनी
नाज़ुक बाहों में समेटने की
कोशिश की और इस कोशिश में
लड़खड़ा कर गिरने ही वाली थी
मैंने थाम लिया
सहारा देकर बैठाया
उसने अपनी बेहद तेज हो गयी
सांसों को धीरे-धीरे संयत किया
दोनों एक-दूसरे को देर तक 
देखते रहे अपलक अवाक
मैंने आँखों-आँखों में ही उसे
आश्वस्त किया,
"मैं लौटाऊँगा इस घर की ख़ुशी
मुस्कान, उल्लास, उमंग
पुनर्नवा करूँगा इस घर को"
उसने बस पलकों को झुका लिया
उसने कुछ कहा नहीं
बस पलकें झुका लीं
शायद ये मेरे प्रस्ताव को 
मौन स्वीकृति और समर्थन था
अब शुरू हुआ मेरा प्रयास-संघर्ष
जब कभी मुझे लगा
मेरा प्रयास रंग ला रहा है
बाधाओं ने पलटवार किया और
मैं प्रयास-बिंदु से भी पीछे
धकेल दिया गया
फिर भी, कोशिशें जारी रहीं-
दोनों तरफ से
धीरे-धीरे मैंने महसूस किया
मेरा अस्तित्व विलीन होता जा रहा है
उस घर की वीरानियों में
मैं उस घर की उदासियों का
अभिन्न हिस्सा बनता जा रहा था
लेकिन, अब देर हो चुकी थी
पीछे हटने या बाहर जाने का
कोई उपाय नहीं था
अब मैं भी उसी वीरानी का हिस्सा हूँ
कोई भी नहीं कह सकता कि
मेरा कभी कोई स्वतंत्र अस्तित्व भी था
हालांकि मैं हूँ अब भी-
निस्तेज-निष्फल-पराजित
सोचता हुआ कि,
"क्या ये कोई ट्रैप था मुझे फंसाने का
बूढ़े शेर की तरह या
इस घर का दुर्भाग्य 
जो इस घर को मिला
मुझ जैसा नाकारा मसीहा?"