Wednesday, June 4, 2014

बड़े से बड़ा सुख भी एक छोटे से दुख को बेदखल नहीं कर सकता दुख का वजूद कायम रहता है सुख के समानांतर एक दुख को दूसरा दुख ही बेदखल करता है परत दर परत दुख की सतह मोटी होती जाती है हम प्रायः सबसे ऊपरी सतह से जूझते रहते हैं सुख तो तात्कालिक और अस्थाई होता है अतिशीघ्र वाष्पित हो जाता है जबकि दुख ठोस और स्थायी होता है घनीभूत होकर जम जाता है संवेदना की जमीन पर.
बड़े से बड़ा सुख भी एक छोटे से दुख को बेदखल नहीं कर सकता दुख का वजूद कायम रहता है सुख के समानांतर एक दुख को दूसरा दुख ही बेदखल करता है परत दर परत दुख की सतह मोटी होती जाती है हम प्रायः सबसे ऊपरी सतह से जूझते रहते हैं सुख तो तात्कालिक और अस्थाई होता है अतिशीघ्र वाष्पित हो जाता है जबकि दुख ठोस और स्थायी होता है घनीभूत होकर जम जाता है संवेदना की जमीन पर.
बड़े से बड़ा सुख भी एक छोटे से दुख को बेदखल नहीं कर सकता दुख का वजूद कायम रहता है सुख के समानांतर एक दुख को दूसरा दुख ही बेदखल करता है परत दर परत दुख की सतह मोटी होती जाती है हम प्रायः सबसे ऊपरी सतह से जूझते रहते हैं सुख तो तात्कालिक और अस्थाई होता है अतिशीघ्र वाष्पित हो जाता है जबकि दुख ठोस और स्थायी होता है घनीभूत होकर जम जाता है संवेदना की जमीन पर.